[ ये ख़ुदा है – 47 ]

पत्रकारों ने ख़ुदा को मजबूर करदिया कि ६ दिस्मबर पर अपने विचार ज़ाहिर करे और भारतीयों को बतादे कि आगे क्या करना है। सर खुजाने के बाद ख़ुदा ने अपनी उंगलियों पर हिसाब करके पत्रकारों से पूछाः वल्लाह हम नही जानते कि छेः दिस्मबर को हमारी मां मरी थी या बाप, इतना याद है कि पिछले वर्ष ६ दिस्मबर को हमें जुलाब लगे थे जब ज़िन्दगी मे पहली बार हमने के एफ़ सी का नाश्ता खाया था और वो भी अमेरिका की ज़बरदस्ती पर।

एक बुज़र्ग पत्रकार ने ख़ुदा के कान मरुड कर कहाः ओओह, आप ख़ुदा हो कि पैजामा, अपको छेः दिसम्बर नही मालूम? छेः दिस्मबर १९९२ बोले तो आज से १४ वर्ष पहले इसी दिन पूरे भारत मे अग लग गई थी, हिन्दू और मुस्लमान एक दूसरे का ख़ून चूसने खड़े होगए थे तब ख़ुदा क्या झक मारने गया था?

बुज़र्ग की कड़क डांट सुनकर और अपना कान सहलाते हुए ख़ुदा ने कहाः ऐसी बात थी तो पहले क्यों नही बताया, हम तो एक भले ख़ुदा हैं हमें ये भी याद नही रहता कि बाथरूम मे फल्श क्या कि नही। ख़ुदा ने अपनी कमर पर हाथ रखे कहाः ये तो बर्सों से रिवायत चली आ रही है कि हिन्दू-मुस्लिम एक दूसरे के लिए ख़ून के प्यासे हैं और ये बात सारी दुनिया जानती ही है तो फिर आज छेः दिस्मबर को क्या ख़ास बात है? दूर से एक पत्थर ख़ुदा के सर पर आ पड़ा इसके साथ ही नारे बाज़ी शुरू हो गईः मुर्दाबाद मुर्दाबाद ख़ुदा मुर्दाबाद……

ख़ूदा को भागने की जगह ना मिली तो वो भी चुपके से सर पर पगड़ी बांधे मोर्चे मे शामिल होकर शुरू हो गयाः मुर्दाबाद मुर्दाबाद ख़ुदा मुर्दाबाद।

ये छेः दिस्मबर का जलूस था जो हर वर्ष इस दिन भारत की गलियों से निकलता है। मोर्चे मे शामिल एक आदमी से ख़ुदा ने पूछा कि भाई, ये किस काम का जलूस है? उस आदमी ने बेख़याली मे जवाब दियाः पता नही यार, हमारे मुहल्ले के मुल्लाओं ने भाषण दिया है कि “आज क़ौम के सारे लोगों पर फर्ज़ है कि अपना कारोबार और सारे काम धाम छोड़ मोर्चे मे आना है क्योंकि आज से १४ वर्ष पहले एक दूसरी क़ौम के लोगों ने बाबर की यादगार इमारत को ढाया था”।

ख़ुदा ने पूछाः क्या आप लोग उस इमारत को दुबारा बनाने जा रहे हो? आदमी ने गुस्से से कहाः आपके सर मे भेजा है कि गोबर, मैं भला ग़रीब आदमी आज तक अपना घर नही बना पाया तो….. फोरन ख़ुदा ने पूछाः फिर ये मोर्चा कहां ले जा रहे हो? आदमी ने तुरंत दांत पीसते कहाः तेरे को दिखता नही क्या वहां सामने और उधर पीछे मुल्ला लोग हमें ज़बरदस्ती ले जा रहे हैं, ज़बरदस्ती आज हमें मज़दूरी ना करने के लिए कहा और अब ज़बरदस्ती धूप मे चलाए जा रहे हैं ना चाय है ना पानी पता नही और कितना चलाएंगे।

नारे बाज़ी के दौरान ख़ुदा ने उस आदमी से पूछाः क्या तुम ख़ुदा को मानते हो? जवाब दियाः अगर वो अपने सामने आजाए तो एक ही मुक्के मे उसके दांत ना तोड़दूं। ख़ुदा ने झटसे अपने मूंह पर हाथ रख लियाः तौबा तौबा ख़ुदा के दांत तोड़ोगे, उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? आदमी ने कहाः ख़ुदा ने मेरा क्या नही बिगाड़ा, ग़रीबी क्या कम थी कि मुस्लमान बना दिया और पिछले चौदाह वर्षों से हर छेः दिस्मबर के दिन अपना कारोबार बंद करके जलूस मे जाना फर्ज़ कर दिया चाहे बीवी बच्चे भूके मरें।

ग़रीब की बात सुनकर ख़ुदा को रोना आया और जलूस को रोक कर सबको अपना हुलिया बतायाः शुक्र है कि हम मुस्लमान नहीं बल्कि ख़ुदा हैं, काहे ग़रीबों को जलूस मे हांक रहे हो? मुल्लाओं के पास करने को कुछ नही तो अपने भाषण से ग़रीबों को भड़काते हो। ग़रीबों का ख़ुदा तो उसकी दो वक़्त की रोटी है फिर काहे ख़ुदा का नाम लेकर उसका ईमान ख़राब करते हो।

ये धर्ती किसी ख़ास क़ौम के लिए नहीं बनाई, पिछले ज़मानों मे भी तुम्हें ख़ाख़ चटाई थी और आज तक भी तुम्हें ज़लील और रुस्वा रख़ा सिर्फ तुम्हारे अंधे विश्वास की वजह से - अपना ईमान तो ख़राब कर ही लिया मगर इन बेचारे ग‌रीबों का दिमाग़ क्यों चाटते रहते हो। ख़ुदा को ख़ुदा की क़सम हम तो बाक़ाईदा ख़ुदा हैं, और तुम लोग ये मन्दिर मस्जिद बनाकर उसे ख़ुदा का घर कहते हो? माफ करना ख़ुदा कभी इन्सानों का मुहताज नही कि वो अपने लिए घर मांगे।

देखो उन बे घर इन्सानों को, देखो उन लोगों को जो थंडी रातों मे सड़कों पर बसेरा करते हैं - और आप हैं कि चले हो ख़ुदा के लिए घर बनाने??? थू है तुम्हारी सोच और विचारों पर, अपने पड़ोसी के घर लाईट नही और चले हो मन्दिर और मस्जिद को रौशनी से जगमगाने? तुम्हारे करतूतों और अंध विश्वास पर ना हंसने को जी करता है ना रोने को - ख़ुदा को तुम इन्सानों की इबादत और पूजा की कोनो ज़रूरत नहीं - तुम इन्सान एक दूजे के लिए हो, एक दूसरे के दुःख सुख मे साथ रहो - मगर पलीज़ हमारे लिए ये मन्दिर मस्जिद ना बनाओ क्योंकि हम तुम्हारे घर जमाई नही। जारी

बाक़ी फिर कभी

This entry was posted on Thursday, December 7th, 2006 at 5:35 pm and is filed under खुदा से मिलो. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

20 comments so far

नीरज रोहिल्ला
 1 

शुऐब जी,
आपके लेख ने अन्तर्मन को झकझोर कर रख दिया है|

सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या वीर,
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फकीर |

ख़ुद में ही जब है ख़ुदा, यहाँ-वहाँ क्यों जाऊँ
अपनी पत्तल छोड़ कर, मैं जूठन क्यों खाउँ |

पाप न धोने जाऊँगा, मैं गंगा के तीर
मजहब अगर लकीर है, मैं क्यों बनूँ फ़क़ीर |

December 7th, 2006 at 8:43 pm
 2 

शुऐब, लगता है इक्कीसवीं सदी के पैग़म्बर आप ही हैं। आप ने खुदा के सन्देश को सही समझा है, और उसे लोगों तक पहुँचाने में लगे हुए हैं। पर साथ ही उस की कमज़ोरियों को भी बेपर्दा करने से बाज़ नहीं आते। पर आप की बातों से मुझे रशदी की बू आती है। अपने सर को बचा कर रखना। मैं आप के लिए दुआ करूँगा।

December 7th, 2006 at 9:17 pm
 3 

शुएब भाई, आपकी भी एक समस्या है, तार्किक बात करते हो यार। नहीं समझ आती अक्ल की बात अब…

December 7th, 2006 at 9:49 pm
 4 

बहुत खूब, क्या बात है, क्या लिखा है वाह भाई वाह!

December 7th, 2006 at 10:02 pm
 5 

बढ़ियां धुँआधार लिखा जा रहा है…बहुत सही!!!

December 7th, 2006 at 10:47 pm
Neeraj Rohilla
 6 

Bhai, I left a comment and it is not showing on the page. Did you get my comment?

Thanks,

December 8th, 2006 at 12:55 am
 7 

वाह! शोएब भाई! वाह!

दिल का हाल दिल खोल के सुना देते हो.

इतने निष्पक्ष विचार होते हैं आपके कि लगता है - काश! सारे ना सही कम से कम सिर्फ़ दिल्ली के ही मुसलमान आपकी सोच के हो जायें तो ही अपने देश से आधी समस्यायें खतम हो जायेंगी.

आऽऽऽमीऽऽऽन!!

December 8th, 2006 at 6:14 am
ghughutibasuti
 8 

yadi dhar_m na hote to shaayad ham kuchh aur to nahee\n par manu\s_y to hote.

December 8th, 2006 at 8:18 am
 9 

बहुत खुब.
सही कहा, अगर कहीं खूदा है तो उसे इंसानों के बनाए घर की जरूरत नहीं.

December 8th, 2006 at 9:05 am
 10 

हमेशा की तरह उम्दा और ज़ायकेदार।

December 8th, 2006 at 10:03 am
 11 

मेरी टिप्पणी कहाँ चली गई?? :(
कित्ती मेहनत कर के लिखी थी..
अब नहीं लिखुंगा. :(

December 8th, 2006 at 11:46 am
 12 

आज खुदा का रुख बदला बदला सा क्यूं लग रहा है? खुदा के मुँह से इतनी बुद्धिमानी की बातें, क्या अमरीका के बंधन ( मेहमाननवाजी से मुक्ति मिल गयी है खुदा को?

December 8th, 2006 at 5:53 pm
 13 

वाह शुएब भाई क्या बात है!!

December 8th, 2006 at 8:25 pm
 14 

ख़ुदा की 47 वीं सिरीज़ पसंद करने के लिए आप सबका धन्यवाद।
इस ब्लॉग पर स्पाम फ़िल्टर्स installed हैं जो कि मोडरेटर की इजाज़त तक ज़ाहिर नहीं होते। चूंकि कल सारा दिन मैं नेट से दूर रहा इसी लिए चंद मित्रों की टिप्पणीयां रूकी हुई थीं जिसके लिए मैं आप सबसे क्षमा चाहता हूं।

December 9th, 2006 at 10:20 am
पंकज बेंगाणी
 15 

मुझे उम्मिद है कि कट्टरपंथी और कठमुल्ले तुम्हारा ब्लोग नही पढते होंगे… नहीं तो गरदन बचाके रखना भाई।

मैं कुछ इसलिए भी उर्दु सिखना चाहता हुँ कि तुम्हारा उर्दु ब्लोग और उसमें आने वाले कमेंट पढ सकुं…. :)

December 10th, 2006 at 9:13 am
 16 

یقینی تؤر پر تُمنے چھ دِسمبر کا مںزر میری آںکھوں میں آج دوبارا اُتار دِیا۔ اُس منہُوس دِن کو میں بھُول نہی سکتا۔ وو دِن میری ساری سوچ کو بدل گیا تھا۔ اَگلے دِن اَخبار میں خبر پڑھی تو نزارا دیکھکر دِل دہل گیا تھا۔ ہِندُو مُسلمان نہیں سِرف اِںسان مرے تھے۔ اِںسانوں کے ہاتھوں۔ آج اِراق اؤر باقی جگہ پر قتل او غارت دیکھکر بھی لگتا ہے کِ ہم اِںسان نہیں ہیوان بن گئے۔

December 10th, 2006 at 9:32 pm
SHUAIB
 17 

@ पंकज बेंगाणी
पंकज भाई, मैं सोच रहा हूं कि “हिन्दी से उर्दू” सीखने के लिए एक वैबसाईट बना डालूं। इस काम के लिए मुझे आप मित्रों की मदद भी चाहिये और कोई अच्छी सी थीम भी। मैं कोशिश करूंगा कि ज्लदी से इस बारे मे कुछ हो और आप भी अपनी राये दें कि कैसे शुरूआत करूं।
यहां कोई मेरा उर्दू ब्लॉग पढ़ कर सरकार को बतादे तो सच मुछ मेरा सर उड़ा देंगे :D

@ नीरज दीवान
नीरज भाई, उर्दू मे टिप्पणी देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। यार ज़रा बताओ कि ये उर्दू टाइप करने के लिए आपने कौनसा साफ्टवेर यूज़ किया है। मैं भी चाहता था कि आपकी इस उर्दू टिप्पणी का जवाब उर्दू ही मे दूं चूंकि इस वक़्त मैं साईबर केफ़े मे बैठा हूं। शुक्रिया जनाब :)

December 12th, 2006 at 9:24 am
 18 

शुयेब भाई

मुझे लगता है कि तुम्हारे चिठ्ठो मे से चुन चुन कर सुक्तियो का संग्रह बनाना पडेगा

ग़रीब आदमी आज तक अपना घर नही बना पाया तो…..

ख़ुदा कभी इन्सानों का मुहताज नही कि वो अपने लिए घर मांगे।

January 10th, 2007 at 10:21 am
 19 

हमेशा की तरह जबरदस्त।
शोएब भाई, अब तो अपना अवार्ड वाला लोगो लगा लो, दाँयी तरफ़ साइड बार में। और हाँ, अब व्याकरण की गलतियाँ कम हो गयी है, फिर भी है थोड़ी बहुत, उनको भी सही कर दोगे तो वल्लाह! मजा आ जाएगा।

January 10th, 2007 at 12:53 pm
 20 

बिलकुल सही लिखा है आपने, व्यक्ति किसी भी धर्म का हो जो रोज सुबह उठकर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने जाता है उसे तो इन जुलूसों और जुलूसों के कर्त्ताधर्त्ताओं के कारण भूखा सोना पड़ता है।

January 13th, 2007 at 11:24 am

2 Trackbacks/Pings

  1. نئی باتیں / نئی سوچ » چودھویں برسی ( 6 دسمبر 2006 ) - First Urdu Blog from India ہندوستان سے پہلا ار    Dec 09 2006 / 12pm:

    [...] باقی پھر کبھی اِس تحریر سے متصل کڑیاں: ہندی زبان میں: یہ خدا ہے 47 ہندی ٹریک بیک: خدائی کی کہانی خدائی کی زبانی [...]

  2. शुऐब » Blog Archive » आपकी टिप्पणी    Dec 09 2006 / 5pm:

    [...] आप सबकी टिप्पणीयां देर से प्बलिश होने पर मैं क्षमा चाहता हूं जो कि वो अपने ब्लॉग पर लगे Spam Filter मे फंसी हुई थीं। इसकी क्या वजह हो सकती है? यह तो मुझे हमारे उस्ताद जीतू दा से पूछना पड़ेगा। [...]

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