20 comments so far
शुऐब जी,
आपके लेख ने अन्तर्मन को झकझोर कर रख दिया है|
सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या वीर,
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फकीर |
ख़ुद में ही जब है ख़ुदा, यहाँ-वहाँ क्यों जाऊँ
अपनी पत्तल छोड़ कर, मैं जूठन क्यों खाउँ |
पाप न धोने जाऊँगा, मैं गंगा के तीर
मजहब अगर लकीर है, मैं क्यों बनूँ फ़क़ीर |
शुऐब, लगता है इक्कीसवीं सदी के पैग़म्बर आप ही हैं। आप ने खुदा के सन्देश को सही समझा है, और उसे लोगों तक पहुँचाने में लगे हुए हैं। पर साथ ही उस की कमज़ोरियों को भी बेपर्दा करने से बाज़ नहीं आते। पर आप की बातों से मुझे रशदी की बू आती है। अपने सर को बचा कर रखना। मैं आप के लिए दुआ करूँगा।
शुएब भाई, आपकी भी एक समस्या है, तार्किक बात करते हो यार। नहीं समझ आती अक्ल की बात अब…
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Thanks,
वाह! शोएब भाई! वाह!
दिल का हाल दिल खोल के सुना देते हो.
इतने निष्पक्ष विचार होते हैं आपके कि लगता है - काश! सारे ना सही कम से कम सिर्फ़ दिल्ली के ही मुसलमान आपकी सोच के हो जायें तो ही अपने देश से आधी समस्यायें खतम हो जायेंगी.
आऽऽऽमीऽऽऽन!!
yadi dhar_m na hote to shaayad ham kuchh aur to nahee\n par manu\s_y to hote.
बहुत खुब.
सही कहा, अगर कहीं खूदा है तो उसे इंसानों के बनाए घर की जरूरत नहीं.
मेरी टिप्पणी कहाँ चली गई?? ![]()
कित्ती मेहनत कर के लिखी थी..
अब नहीं लिखुंगा. ![]()
आज खुदा का रुख बदला बदला सा क्यूं लग रहा है? खुदा के मुँह से इतनी बुद्धिमानी की बातें, क्या अमरीका के बंधन ( मेहमाननवाजी से मुक्ति मिल गयी है खुदा को?
ख़ुदा की 47 वीं सिरीज़ पसंद करने के लिए आप सबका धन्यवाद।
इस ब्लॉग पर स्पाम फ़िल्टर्स installed हैं जो कि मोडरेटर की इजाज़त तक ज़ाहिर नहीं होते। चूंकि कल सारा दिन मैं नेट से दूर रहा इसी लिए चंद मित्रों की टिप्पणीयां रूकी हुई थीं जिसके लिए मैं आप सबसे क्षमा चाहता हूं।
मुझे उम्मिद है कि कट्टरपंथी और कठमुल्ले तुम्हारा ब्लोग नही पढते होंगे… नहीं तो गरदन बचाके रखना भाई।
मैं कुछ इसलिए भी उर्दु सिखना चाहता हुँ कि तुम्हारा उर्दु ब्लोग और उसमें आने वाले कमेंट पढ सकुं…. ![]()
یقینی تؤر پر تُمنے چھ دِسمبر کا مںزر میری آںکھوں میں آج دوبارا اُتار دِیا۔ اُس منہُوس دِن کو میں بھُول نہی سکتا۔ وو دِن میری ساری سوچ کو بدل گیا تھا۔ اَگلے دِن اَخبار میں خبر پڑھی تو نزارا دیکھکر دِل دہل گیا تھا۔ ہِندُو مُسلمان نہیں سِرف اِںسان مرے تھے۔ اِںسانوں کے ہاتھوں۔ آج اِراق اؤر باقی جگہ پر قتل او غارت دیکھکر بھی لگتا ہے کِ ہم اِںسان نہیں ہیوان بن گئے۔
@ पंकज बेंगाणी
पंकज भाई, मैं सोच रहा हूं कि “हिन्दी से उर्दू” सीखने के लिए एक वैबसाईट बना डालूं। इस काम के लिए मुझे आप मित्रों की मदद भी चाहिये और कोई अच्छी सी थीम भी। मैं कोशिश करूंगा कि ज्लदी से इस बारे मे कुछ हो और आप भी अपनी राये दें कि कैसे शुरूआत करूं।
यहां कोई मेरा उर्दू ब्लॉग पढ़ कर सरकार को बतादे तो सच मुछ मेरा सर उड़ा देंगे
@ नीरज दीवान
नीरज भाई, उर्दू मे टिप्पणी देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। यार ज़रा बताओ कि ये उर्दू टाइप करने के लिए आपने कौनसा साफ्टवेर यूज़ किया है। मैं भी चाहता था कि आपकी इस उर्दू टिप्पणी का जवाब उर्दू ही मे दूं चूंकि इस वक़्त मैं साईबर केफ़े मे बैठा हूं। शुक्रिया जनाब ![]()
बिलकुल सही लिखा है आपने, व्यक्ति किसी भी धर्म का हो जो रोज सुबह उठकर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने जाता है उसे तो इन जुलूसों और जुलूसों के कर्त्ताधर्त्ताओं के कारण भूखा सोना पड़ता है।
[...] باقی پھر کبھی اِس تحریر سے متصل کڑیاں: ہندی زبان میں: یہ خدا ہے 47 ہندی ٹریک بیک: خدائی کی کہانی خدائی کی زبانی [...]
[...] आप सबकी टिप्पणीयां देर से प्बलिश होने पर मैं क्षमा चाहता हूं जो कि वो अपने ब्लॉग पर लगे Spam Filter मे फंसी हुई थीं। इसकी क्या वजह हो सकती है? यह तो मुझे हमारे उस्ताद जीतू दा से पूछना पड़ेगा। [...]