चूंकि “ख़ुदा” पर किस्तें, पहले उर्दू मे लिखना शुरू किया था - फिर किस्त नम्बर २२ या पच्चीस से उसी सीरियल नम्बर के साथ हिन्दी मे भी एक साथ पोस्ट करने लगा। जब भी मुझे फुरसत मिले तब उर्दू मे शुरू की लिखी किस्तों का ट्रांसलेट हिन्दी मे भी पोस्ट करने की कोशिश करूंगा।

अब तक ख़ुदा सिरीज़ की 49 क़िस्तें पोस्ट करचुका हूं, अब पचासवी किस्त लिखने का काम जारी है। चूंकि ये पचासवीं किस्त कुछ ज़्यादा लम्बी होती जा रही है पता नहीं किस बात पर लेख खतम हो लेकिन लिखने का काम जारी है।

आप सभी को धन्यवाद और शुक्रिया अदा करता हूं जो ख़ुदा की सिरीज़ को पढकर पसंद किया और अपनी टिप्पणीयों से नवाज़ा।

ख़ुदा की पचासवीं और शायद आखिरी किस्त का इनतेज़ार है। वैसे भी इन किस्तों को लिखना बंद करने मेरा दिल नहीं मानता।

This entry was posted on Friday, January 26th, 2007 at 4:21 pm and is filed under खुदा से मिलो. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

12 comments so far

 1 

आपका भी मन नहीं मानता और हमारा भी, कृपया इसे बन्द ना करें। आपके खजाने में विषयों की कोई कमी नहीं है।
आपसे अनुरोध है कि इस सीरीज को जारी रखें

January 26th, 2007 at 5:21 pm
संजय बेंगाणी
 2 

अरे मिंया अभी अभी तो शुरू की है, खुदा श्रेणी. खुदा को भी थोड़ा पृथ्वी का आनन्द लेने दे.
अभी बन्द करने की क्या जरूरत है? खुदा के बीना भी कोई जीना है?
हमारा अनुरोध है, इस शृंखला को जारी रखे.

January 26th, 2007 at 5:27 pm
 3 

गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें.

आपसे आग्रह है कि इस सीरीज को जारी रखें जनता की फरमाईश पर. :)

January 26th, 2007 at 6:21 pm
 4 

देखो मियाँ ये सही बात नहीं है, भक्त (पंडित जी) और भगवान (खुदा) को जुदा करने का तुम्हें कोई हक नहीं। :)

बाकायदा सीरीज जारी रखी जाए। चाहे महीने में एक पोस्ट लिखें।

January 26th, 2007 at 6:49 pm
premlata
 5 

गणतंत्र-दिवस की शुभकामनाएं!
ख़ुदा/परमात्मा तो कण-कण में है!!!

January 26th, 2007 at 7:37 pm
 6 

शुएब भाई ,गणतंत्र-दिवस की बहुत - शुभकामनाएं! लिखने का क्रम जारी रखें, आखिरी किस्त का बेसब्री से इन्तजार रहेगा।

January 26th, 2007 at 7:54 pm
 7 

आज कमेन्ट करते समय अच्छा लगा कि तुमने जासूसों ( Mr Spam )को हटा लिया। :)

January 26th, 2007 at 7:59 pm
 8 

ग़ालिब साहब के दो शे’र मुलाहिज़ा फरमाएँ

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता?

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद,
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है?

ख़ुदा की किसी क़िस्त को आख़िरी कहने का आप को कोई हक़ नहीं है, शुऐब। ख़ुदा की कलम तो चलती रहनी चाहिए — पढ़ने वालों को इन्तज़ार है।

January 27th, 2007 at 12:53 am
 9 

बेश्क बंद कर दिजिये पर KBC की तरह खुदा का नया संस्करण जारी कर दें। :)

January 27th, 2007 at 8:08 am
SHUAIB
 10 

आप सभी को गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें और टिप्पणीयों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। दरआसल मेरे पास वक़्त की कमी है, मुझे हर दिन लम्बी यात्रा करनी पड़ती है। मैं ने ब्लॉगिंग करना छोड दिया ऐसा तो नहीं लिखा और ना ही मैं ब्लॉगिंग छोड सकता हूं। ब्लॉगिंग मेरे जीवन का जैसे एक हिस्सा है रही बात “ख़ुदा” पर लेखों की, मैं कोशिश करता रहा कि हर ख़बर के साथ ख़ुदा की की टांग खींची जाए। अच्छे बुरे कामों के लिए ख़ुदा को ज़िम्मेदार टेहराना हम मे जैसे एक रिवायत बन गई है और गंदे कामों के लिए हम शैतान को याद करते हैं कि ये सब सिर्फ शैतान की वजह से हुआ है। हर अच्छे बुरे और गंदे कामों का ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ इनसान ही है जिसमे ख़ुदा और शैतान का कोई दोष नही। आप दोस्तों का प्यार और विरोध देखते हुए मैं अपनी बात वापस लेता हूं और कोशिश करूंगा कि वक़्त वक़्त पर ख़ुदा की टांग खींचता रहूं ताकि ख़ुदा की ये सिरीज़ आगे बढती रहे। आप सब का एक बार फिर धन्यवाद

January 27th, 2007 at 11:23 am
 11 

शुयेब भाई,

खुदा -१ को आप बंद करदे कोइ समस्या नही है। लेकिन हम प्रमेन्द्र का समर्थन करते है कि खुदा-२ शुरू की जाये

January 29th, 2007 at 12:28 pm
 12 

शुएब भाई,

बहुत दिनों बाद नारद की तरफ़ चक्कर लगा…
वहाँ से आपके दर पर आया और देखा कि माजरा क्या है.

आप खुदा सीरिज को बन्द करने कि फ़िराक में हैं, और दुनिया तो खुद खुदा ही को बन्द करने कि फ़िराक में है.

वैसे इस मुआमले में एक पुराना शेर याद आ रहा है, (भक्त जनों) दाद चाहुँगा:-

आगे “खुदा” है, पीछे “खुदा” है,
दाएं “खुदा” है, बाएं “खुदा” है,
उपर “खुदा” है, नीचे “खुदा” है,
यहाँ “खुदा” है, वहाँ “खुदा” है,
इधर “खुदा” है, उधर “खुदा” है,
:
:
और जहाँ “खुदा” नहीं है,……
:
वहाँ “खुदाई” चल रही है!!

तो भाईजान, आप भी थोडा समय निकाल कर अपनी “खुदाई” जारी रखें.
यही गुजारिश है.

January 30th, 2007 at 7:37 am

Leave a reply

Name (*)
Mail (will not be published) (*)
URI
Comment