[ ये ख़ुदा है - 58 ]

आकाश की ओर देख कर ख़ुदा ने कहाः शायद वर्षा होने को है। किसी ने ख़ुदा को पहचानलिया जो बुर्ख़ा पहनकर लम्बे क़दम नाप रहा था। ख़ुदा को रोक कर पूछाः आलिजाह, इस बुर्खे मे आप कहां? ज्लदी मे ख़ुदा ने जवाब दियाः मियां रास्ता छोडो, हम जिहाद की राह मे रवांदवां हैं। ख़ुदा से पूछाः बुर्ख़े मे काहेका जिहाद? ख़ुदा ने जवाब दियाः इस दौर मे फटे कप्डे पहनकर तुम लोग जिसे फेशन कहते हो - अगर जिहाद की राह मे पाऊँ लडखडा जाएं तो बुर्खे मे फ़रार होना हम मुजाहिदीन का स्टाईल है। इस के अतिरिक्त हिम्मत करके ख़ुदा से पूछलियाः मगर बुर्खे का… जिहाद… से क्या… मतलब??… खींचकर एक चमाट मारने के बाद ख़ुदा ने फरमायाः मियां काहे सवाल पे सवाल मार रहे हो? वल्लाह हम सब्ज़ी मार्केट जा रहे हैं और बुर्खा इस लिए ताकि कोई ना पहचाने - कम्बख़्त लोग ख़ुदा को देखा नहीं कि आटोग्राफ लेने टूट पडते हैं।… ख़ुदा ने मूंह बसौर कर अपने चहरे पे नक़ाब डाला और मटकते हुए सबज़ी मार्केट चला गया।

आज यहां ज़बर्दस्त वर्षा के बावजूद हज़ारों दर्शकों के सामने ख़ुदा ने भाषण पढ़ा, तभी किसी ने उत्सव स्थल मे ‘बम’ की अफ़वाह उडाई तो लोगों मे भगडर मच गई और बीच मे पुलिस कूद पडी। सबसे पहले ख़ुदा की तलाशी हुई तो ख़ुदा ने अपने सारे जेबों को झाडा कुछ ना मिला फिर भी पुलिस वालों ने ख़ुदा को पीटा कि क्यों कुछ नहीं? कुछ तो होनाच है आख़िर आप ख़ुदा हैं। जबसे ख़ुदा धरती पे उतरा, बहुत से उत्सवों मे बम फट चुके जिसमे कई लोग ख़ुदा को प्यारे हुए बाकी ने अपना नाम घायलों की लिस्ट मे लिखवा लिए। पुलिस की मारपीट से तंग मजबूरन ख़ुदा ने क़बूल करलियाः हां अपने पास बम था जिसे हमने खालिया अब वो हमारे पेट मे है। पुलिस ने ख़ुदा को फोरन छोड दिया की आप कहीं दूर जंगल चले जाएं और बाथरूम होकर ज्लदी वापस आएं। इस सुनहरे अवसर पर ख़ुदा फरार होने मे काम्याब रहा - शाम को दुबारा उत्सव मनाने की कोशिश की मगर नाकाम रहा।

दूसरे दिन समाचार माध्यम वालों से बातचीत के दौरान ख़ुदा ने बतायाः भई पत्रकारों, ज़ालिम पुलिस वाले हमें खींचते हुए थाने ले गए थे और ज़बर्दस्ती क़बूल करवालिया कि हम “आत्मदाही” हैं हालांकि अपने को पटाख़ों से भी डर लगता है, आसमान मे बिजलीयां कडकडाते हुए हम ख़ुद सहम जाते हैं। हालांकि आत्माहत्य करना हराम है, भला हम कैसे ख़ुदको बम से बांधलें? ख़ुदा ने गला फाड कर रोते हुए कहाः हमने पुलिस के आगे अपने सारे हाथ जोड दिए कि हमारे पास ‘बम’ जैसा कोई वस्तु नहीं फिर भी इतना मारा उतना मारा - वल्लाह ऐसी वैसी जगा मारा कि हम सहला भी नहीं सकते और मजबूरन क़बूल लियाः हां हम आत्मदाही हैं। मीडिया वालों से ख़ुदा ने कहाः ज़रा तफ़तीश करना कि क्या वो असली पुलिस थी, चूंकि ज़माने के साथ चीज़ें नक़ली होती जारही हैं। ज़ालिम पुलिस वाले किसी को भी पकड लेजाते हैं ज़बर्दस्ती जुर्म क़बूल करवाते हैं और असली बदमाश आवारा आज़ाद घूम रहे होते हैं।

ख़ुदा को याद दिलायाः आपकी बात सच साबित हुई, हैदराबाद मे मक्का मस्जिद घटना के बाद फिर से धमाके हुए जिसमे क़रीब चालीस लोग छांटे गए। ख़ुदा ने अपनी तारीफ़ मे फ़रमायाः मियां, हमारी बात पत्थर पे लकीर है, और ये कोई आख़िरी धमाका नहीं “बम का बदला बम” ये सिलसिला जारी रहेगा लोग यूं ही छेतडे फाडे मरते रहेंगे। वैसे भी भारतीयों के लिए बम धमाके रोज़ का मामूल है (जिस दिन कोई घटना ना हो, ये आश्चर्य की बात है।) ख़ुदा ने ख़ुद के कान मे कहाः अच्छा है ये धार्मिक लोग आपस मे लडते रहें मरते रहें और ख़ुदा का काम आसान करते रहें। ख़ुदा ने आश्चर्यजनक के साथ फरमायाः धर्म की शुरूआत दंगों से हुई, आज भी दंगों पर चल रहे हैं और इसका अंत भयानक दंगों पर होगा। धर्म पर चलने वालों का किस्सा सिर्फ इतना कि ये एकदूसरे से डरकर चलते हैं पता नहीं कौन कब भारी पड जाए। ख़ुदा ने फरमायाः ख़ुदा को अपने ख़ुदा होने की क़सम! हमने तुम इंसानों को थोडी बहुत सूझ बूझ दिए थे मगर तुम लोगों ने एक बार सम्झलिया तो दुबारा सोचने की ज़रूरत ना सम्झा। ख़ुदा की लानत है ऐसी बुद्धियों पर जो सम्झदार होकर भी सोचने से डरते हैं।

एक ग़रीब ने ख़ुदा से कहाः आप भाग्यशाली हैं कि ख़ुदा बन गए और हमे देखलो जनम से ग़रीब हैं। हंस्ते हुए ख़ुदा ने जवाब दियाः भई ग़रीब! ख़ुदा ने कभी किसी के पेट पे लात नहीं मारा सिवाए पिछाडे के। ये इंसान के हाथ मे है कि चाहे अमीर बन जाए अगर हौसला नहीं तो ग़रीब हो जाए। ख़ुदा ने फ़रमायाः हमने सभी इंसानों को एक जैसी अक़ल दिया था, किसी ने सम्झदारी से सम्झा और कोई सम्झदार होकर भी ना सम्झा - मिसाल हैः “ग़रीब अचानक राजा और राजा अचानक ग़रीब हो जाए” गीतांजलि ताज़ा मिसाल है। ख़ुदा ने बतायाः हमारा भाग्य इस लिए चमक उठा क्योंकि उस युग मे कोई दूसरा ख़ुदा होने के लायक़ ना था चूंकि उस समय जहाँ मे कोई था ही नहीं, इसी लिए आख़िरकार हमें ही ख़ुदा बन्ना पडा। ख़दा ने फ़रमायाः धरती पर कई उच्चस्तरीय लोग गुज़रे जो ग़रीबी मे जनम लिया फिर ऐसे वैसे कारनामे कर दिखाए कि धन, यश और मान से माला माल हो गए।

ख़ुदा से पूछाः उसामा बिन लादिन की स्वास्थ्य कैसी है? ज़माना हुआ, उनका ताज़ा वीडियो रिलीज़ ना हुआ। ख़ुदा ने जवाब दियाः वो ठीक हैं, अमेरिका मे ऐश कर रहे हैं। बडे महनती इंसान निकले, अफ़ग़ानों को पटाने मे काम्याब रहे और लम्बे अरसे तक अमेरिकी मोहरा बने रहे, इन्हें बहुत बडी क़ीमत वसूल हुई शर्त ये कि छुपे रहें।… मियां आपकी फ़र्माइश पर उनका सिल्वर जोब्ली विडीयो रिलीज़ हो चुका है। ख़ुदा ने बतायाः अलक़ाईदा के पट्ठू पठान कश्मकश मे हैं कि उसामा ज़िन्दा है या मुर्दा? पठानों को अब भी यक़ीन है कि उसामा पूरे विश्व पर राज करेंगे और हम पठानों को अलग अलग देशों मे मन्त्री बनाएंगे। मगर इन पठानों को अहसास ही नहीं कि इनकी पत्नीयां और बेटीयां अमेरीकन आर्मी की लोंडीयां बन चुकी जो की उनकी आरज़ू भी यही थी - चोरी छुपे भारतीय फ़िल्में देख इनके अंदर उमंगें जाग उठी। उसामा की मार्केटिंग रंग लाई जिसकी वजह से अफ़ग़निस्तान मे महिलाओं को अमेरिका ने आज़ादी दिलवाया। हालांकि सद्दाम और अरफ़ात दोनों भी अमेरिकी मोहरा बने थे लेकिन बदले मे अपनी ही जान देकर उलटा क़ीमत चुकाना पडा। दरअसल ये एक पहेली थी जो अब तक ना सुलझी।

आईने के सामने खडे होकर ख़ुदा ने सुर मे क़सीदे पढे। पूछा तो फ़रमायाः मियां, रेहर्सल चल रहा है ताकि मुशर्रफ़ की अर्थी पर उनके सिरहाने इन क़सीदों को कंठस्थ होकर पढा जाए। बेचारे मुशर्रफ़ ना इधरके ना उधरके, आगे पीछे दोनों तरफ़ खाई है। आख़िर कबतक अमेरिका की गोदी मे बैठे रहते! दूसरों को भी बैठने का मौक़ा मिलना चाहिए। पाकिस्तान मे ताज़ा वार्दात पर ख़ुदा ने कहाः इस देश को ईराक़ बनने मे शायद ज़्यादा देर नहीं, ज़ात पात के नाम पर दंगे कब शुरू हों कोई समय तै नहीं। अगर पाकिस्तानी जनता चाहे तो गणतन्त्र की तरह शांती से रह सकते हैं मगर मुल्लाओं का क्या भरोसा, ये कभी भी सटक सकते हैं। अफ़ग़ान, ईराक़ और फ़िलिस्तीन की मिसालें सामने हैं… पहले अमेरिका की चम्चागिरी फिर आपस मे वैमनस्य और एक ना ख़त्म होने वाला सिलसिलेवार आतंक!! समय बहुत कम है उदार विचारकों के लिए इशारा काफ़ी है। अगर पाकिस्तान को ईराक़ और अफ़ग़ान होने से बचाना है तो सोच सम्झ कर क़दम उठाना है चूंकि वैमनस्य की चिंगारी सुलग चुकी है। ख़ुदा ने चाहा तो पाकिस्तान की मदद फ़रमादे मगर पहले मुल्लाओं को सम्झाओ कि वो ख़ुदा को सम्झे लेकिन ये सम्झते हैं कि ख़ुदा सिर्फ़ इन्ही का है।

ख़ुदा ने ख़ुद का नाम लिए बग‌़ैर फ़रमायाः हमने नवाज़ शरीफ़ को पूरे चार घंटे तपाया, हमारे ही हुक्म पर चार घंटों के लिए पाकिस्तान पधारे और सटपटागए। यूं तो होनाच था, अब बेनज़ीर को भी उतरना है फिर इन्ही हालात मे मुशर्फ़ को टपकना है। अवाम यूंही बिलावजे गला फाड रहे हैं, यहां हर कोई किसी पार्टी के नाम पे नारे मार रहे हैं। जानते नहीं कि आगे क्या होने वाला है अगर सम्झदार होते तो सभी अमेरिका की आवाज़ से आवाज़ मिलाते। पाकिस्तान मे कहीं भी एकता नहीं किसी मे भी इतिहाद नहीं, अगर इन मे इतिहाद होता तो आज अमेरिका की उंगलीयों पर इस्तरह नहीं नाचते बल्कि उलटा अमेरिका को नाकों चने चबाते जिस्तरह बेव्कूफ़ कहलाने वाले अफ़ग़ान आज भी अमेरिका की नाक मे घुसकर बालों को खरोच रहे हैं। ख़ुदा ने फिर एकबार अपना नाम लिए बग़ैर फ़रमायाः ख़ुदा की क़सम! हमने किसी को ताक़त व दौलत नहीं दिया बल्कि इंसान ने ख़ुद अपनी क़िस्मत आप बनाया, अब जब तुम्हारे हौसले पस्त होचुके तो अमेरिकी ग़ुलामी ही सही, तुम अमेरिका के बाप ना बनसके मगर वो तु्महारा बाप ही सही। छोडो ये मैंपना, ग़रूर, ज़िद शाणपती। बीते ज़मानों से रिवायत है कि ताक़त्वर राजा ही हमेशा कमज़ोर राजा पर भारी पडता है। माना कि तुम आत्मसम्मान पाकिस्तानी हो मगर ख़ुद अपने पाऊँ पर हथौड़ा मारकर ख़ुदा से मदद की भीक ना मांगो।

ख़ुदा से पूछाः इतने दिनों कहां चले गए थे कि ये चिट्ठा आपके बग़ैर बिलकुल वीरान हो गया। ख़ुदा ने जवाब दियाः घंटा हिला रहे थे!! मियां, हमें और भी काम होते हैं आख़िर हम ख़ुदा हैं। चौबीसों घंटे दुनिया घुमाना, विभिन्न देशों मे बारिश बर्साना, कहीं बर्फ़बारी तो कहीं समुद्री तूफ़ान उठाना, एकसाथ पेरो मे भूकंप और बंगलादेश मे सेलाब चलाना, इंसान हैवान सबकी ख़बरगिरी करना, किसी को भूका मारना और किसी को गले तक खिलाना वगै़रा वगै़रा वगै़रा। ख़ुदा ने बतायाः इतने सारे कामवकाज के बावजूद फिर भी इन क़िस्तों मे आकर एकआध बकवास कह डालते हैं यानी अपने दिल की भडास उगल जाते हैं। अब चंद दिनों से टाईम ही ना मिला कि पूछते हो ये चिट्ठा हमारे बग़ैर वीरान हो गया जैसे बकवास पढने के लिए यहां कुछ भी मवाद ना मिला? अमां यार, इस चिट्ठे पर ख़ुदा की कृपा से पूरे 57 क़िस्तों मे एकसे बढकर एक बकवास मौजूद है, अब ये 58वीं बकवास क़िस्त भी अपलोड हो गई। पढते रहो, अगरचे ये बकवास क़िस्तें हैं मगर ख़ुदा के पवित्र शब्द हैं।

ख़ुदा ने पूछाः क़ानून बकवास है या बकवास ही क़ानून! कहने को भारत मे सभी के लिए एक ही क़ानून है, देखा जाए तो यहां अमीर और ग़रीब के लिए दो अलग कानून हैं मगर अचानक हैरांगी होती है जब कभी कभार अमीरों को ग़रीबों के क़ानून से जकड दिया जाता है। अकसर अमीरों से लेदे कर सुलाह हो जाती है अगर क़ानून ज़िद पर आजाए तो अमीरों से लेकर भी देने से साफ़ इनकार करदिया जाता है। संजय को अंदर बाहर की हवा खिलाता है, हर्षद को पैसों से तोला जाता है, लालू को मन्त्रित्व बनाया जाता है और स्लमान के साथ नाच गाने के बाद उलटा क़ीमत वसूल करता है। कई बार क़ानून के रखवाले खुद मुज्रिम होते हैं, पुलिस और सेना मे ऐसे वैसे जुर्म होते हैं कि सुनकर भी यकीन नहीं आता रखवालों का ये हाल है तो इनको देखकर ख़ुदा का हंस्ते बुरा हाल है। भारत सचमुच अजीब देश है, यहां की घूसखोरी देश की राजनीति भी है और रिवायत भी। ख़ुदा ने फ़रमायाः अंडरवर्लड डॉन को चाहे तो अभी पकडले मगर साथ ही कई राजनीतिज्ञ की पोल खुलजाए। विश्व के सभी देशों मे घूसखोरी मौजूद है मगर भारत एक ऐसा देश है यहां घूसखोरी सभी की ज़रूरत है जैसे चलने फिरने के लिए पाऊँ का होना ज़रूरी है।

उत्सव स्थल मे दर्शकों से ख़ुदा ने अपनी तारीफ़ मे ख़ुद फ़रमायाः वल्लाह, हम अपनी जवानी मे ऐसी थे वैसे थे, बहुत ही ख़ूबसूरत थे कि किसी को मूंह दिखाने के क़ाबिल ना थे। वो इसलिए उस समय विश्व मे कोई था नहीं किसको अपना मूंह दिखाते? अपनी जेब से बचपन का फ़ोटो निकाल ख़ुदा ने दर्शकों को दिखाया तो सभी ओंधे मूंह गिरकर बेहोश हो गए। ख़ुदा ने दर्शकों को होश मे लाने के बाद कहाः माफ़ कीजिएगा, चूंकि हमने अपनी पर्वरिष ख़ुद कर लिए थे इस लिए बचपन मे वैसे थे। अपनी दूसरी जेब मे हाथ डालकर ख़ुदा ने कहाः अब ज़रा हमारी जवानी का फ़ोटो भी देखलें! दर्शक उठकर 9×2=11 हो गए। दूसरे दिन अख़बारों मे ख़बर थीः “ख़ुदा के चित्र देख कई लोगों को अंजान बुख़ार चढ गय।” इस ख‌़बर पर टिप्पणी करते हुए ख़ुदा ने पत्रकारों से फ़रमायाः चूंकि हमने अपनी पर्वरिष ख़ुद कर बैठे, इसलिए बचपन मे कुछ यूं थे। और अपनी जवानी का पता नहीं कब आई चली गई। ख़ुदा ने कहाः ये चित्र हमने अपने हाथ से बनाए थे क्योंकि उस ज़माने मे केमरा का वजूद ना था।

प्रतिभा के लिए ख़ुदा ने अपनी दुआएं छोडाः श्रीमतीजी, आप भाग्यशाली हैं कि भारत की पहली महिला प्रज़िडंट उभरीं। अब ज़रा संभलके, ये भारत देश है पूरे देढ सौ करोड भारतीयों का दिल जीत कर दिखाएं। बतौर पहली महिला राष्ट्रपति ख़ुदा आपके साथ है। मगर भारतीयों की मर्ज़ी कि आपको कबतक टिकाए रखे चूंकि जब ख़ुदा भारत आया था, धरती पे उतरने तक नहीं दिया बल्कि कई घंटे हवा मे ही लटकाए वापस भेजदिया (बडे आत्मसम्मानी भारतीय हैं।) प्रतिभा के लिए ख़ुदा ने फ़रमायाः देश की सबसे ऊंची कुर्सी की इज़्ज़त का ख़याल रखें - आप इस देश की मां सम्मान हैं इसलिए सबको एक ही नज़र से देखें एक जैसा प्यार बांटें। ख़ुदा ने अपनी खोपडी खुजाते पूछाः अमां यार, अब कौनसा नया सिस्टम चल निकला कि भारत मे ऊंची कुर्सीयों पर मुस्लमानों को बिठाया जा रहा है! ये राजनीतिज्ञों के लिए चांदी और मुस्लमानों के लिए पीतल का कटौरा जैसा है। ख़ैर जो भी है आपस मे मिलबांट कर खाएं और खिलाएं ख़ुदा सब देख रहा है। फ़िलहाल अपने धर्म को देखने स्केंड शो जाना है।

ख़ुदा ने पूछाः ये क्या बात हुई कि अकसर हिन्दी फ़िलें एक जैसी होती हैं? ना सर ना पाऊँ, इन फ़िल्मों की कहानी मे कभी हीरो पंजाब से तो कभी हीरोइन पंजाब से या फिर पूरी फ़िल्म पंजाब ही से होती है। भारत मे पंजाब के अलावा और भी शहर मौजूद हैं मगर फिल्मों मे पंजाब का होना जैसे एक पवित्र बात हुई!! ख़ुदा ने कहाः कल रात स्केंड शो मे अपने धर्म को देखा, कई ज़मानों बाद पर्दे पर वैसे ही गर्म नज़र आए मगर फिर भी फिल्म चलते जैसे पेट्रोल ख़त्म हो गया। ख़ुदा ने बतायाः अबकी फिल्मों मे बकवास के सिवा कुछ नहीं जब्कि आज भी भारतीय फिल्में पाकिस्तानीयों के लिए ओढना बिछोना से कुछ कम नहीं। ख़ुदा ने निर्माता और निर्देशकों से फ़रमायाः आप लोगों को ख़ुदा का वास्ता, कुछ तो अच्छी फिल्में बनाओ कि राहती मिले चलो एक अच्छी फिल्म देखने मे पैसे खर्च हुए जिसमे मनोरंजन के साथ एक पैग़ाम भी मिले फ़िर धमाल जैसी एक और फ़िल्म देखने को मिले। ऐसा नहीं कि फिल्म के शुरू होते हीरोइन अपनी टांग उठाई तो गाना, टांग हिलाई तो गाना। कुछ ना करे फिर भी कुछ करने को गाना और गाने भी ऐसे ख़ुदा की पनाह, ख़ुदा को अपने साथ सेक्रेट्री लाना होता है।

ख़ुदा ने बतायाः जब हम छोटे और बिलकुल नन्हे मुन्ने थे, अपनी इच्छा ये थी कि बडे होकर डॉक्टर बनेंगे। मगर आजके हालात देख कर शुक्र मनाते हैं कि अच्छा हुआ हम डॉक्टर ना बने वरना ग्लासगो घटना के बाद सरकारें सबसे पहले ख़ुदा से तफ़तीश करते और ख़ुदा को भी ख़ाम्ख़ा क़बूल करना पडता कि हां ये घटना एक चमत्कार था। ख़ुदा ने फ़रमायाः बेंगलूर की अमनपसंद जनता का नाम आतंकवादीयों की लिस्ट मे जोडने की कोशिश नाकाम रही, अमनपसंद लोगों का ख़ुदा साएबान। बेंगलूर, जहां दुनिया भर की आईटी-बीटी कम्पनीयों के निवेश से लाखों भारतीयों को रोज़गार मिला और अपने मिज़ाज जैसा ख़ुशबहार मौसम मिला। ख़ुदा ने कहाः हमें अफ़सोस है कि डॉक्टर बन ना सके बावजूद डॉक्टरी जैसे पेशे की इज़्ज़त करते हैं जो धर्म-ज़ात को देखे बग़ैर सभी इंसानों का इलाज करते हैं। और इन्ही डॉक्टरों की बदौलत आज ख़ुदा की कुछ शान बाक़ी है - लोग ये जानते हुए भी कि ख़ुदा सब देख रहा है, फिर भी बहुत कुछ करजाते हैं जब्कि डॉक्टरों के आगे शर्मिंदा खडे होते हैं।

गिरगिट को देख कर ख़ुदा ने कहाः बदमाश बडा रंगीन मिज़ाज है, देखो किसतरह अपनी खाल को रंगों मे बांट रहा है! ख़ुदा को याद दिलायाः जहाँपनाह, ये गिरगिट रंगीन मिज़ाज नहीं बल्कि है ही रंगीन मगर ख़ुदा की तरह रंगीला नहीं कि किसी को गोरा बनाया तो किसी को काला, किसी को हिन्दू और किसी को मुसल्मान बनादिया। तुरंत ख़ुदा दहाड उठाः मियां, कयों अनापशनाप बक रहे हो! वल्लाह, ख़ुदा ने कभी किसी को ज़ातों मे नहीं बांटा। सभी को मुकम्मल और शुद्ध इंसान बनाया था, हमें क्या खुजली पडी थी कि इंसान बनाने के बाद इनमे धर्म और ज़ातपात की केटग्री बनाते?? ये तुम इंसानों का सिलसिला है कि औलाद का धर्म वही जो माता पिता का होता है और धर्मों की ईजाद तुम्हारे बुज़र्गों ने किया था जो पिछले ज़मानों मे कामकाज ना होने की वजह से संसार मे फूट डालकर अजब ज़ात बना गए और बचपन से ही दिमाग़ों पर ताले मार गए जिसकी चाबी पास रहते भी तुम्हें दिखाई नहीं देती। ख़ुदा को अपने ख़ुदा होने की कसम! धार्मिक होना आसान है मगर धर्म को सम्झना किसी माई के लाल मे हिम्मत नहीं। और जिसने धर्म को पहचानलिया वो धार्मिक नहीं बल्कि सच्चा इंसान है।

ख़ुदा ने फ़रमायाः हम उन परिवारों के दुःख मे बराबर शामिल हैं जिन लाल मस्जिद के विद्यार्थीओं को सही टाइम पे बुर्ख़े ना मिलने की वजह से अपनी ही सेना के हाथों बेमौत मरना पडा। ख़ुदा ने बतायाः तालिबान (विद्यार्थीओं) ने अपने नमन के दौरान नाक रगड्ते हुए ख़ुदा से मदद की फ़रियाद करते रहे (मियां, क्या ज़रूरत थी हल्ला मचाने की। अपने ही पाऊँ पर हथौड़ा मारकर ख़ुदा से पट्टी बांधने की फ़रियाद करते हो!) ये सिर्फ आज और कल की बात नहीं बल्कि बीते ज़मानों से भी “आत्मसम्मानी मुजाहिदीन” मदद के लिए ख़ुदा को पुकारते नहीं थकते और ख़ुदा बग़ैर थके उनकी सुनीअनसुनी करदेता। आख़िर क्या फ़ाईदा ऐसे जिहाद का? हमेशा इस उम्मीद से कि ख़ुदा जिहाद करने वालों के साथ है बावजूद फिर भी जिहादीयों का ही नुक़्सान है, बुरी मौत मरने के बाद अपनों की नज़र मे शहीद मगर सारी दुनिया की नज़रों मे आतंकवादीयों की भयानक मौत!! ख़ुद मुजाहिद बन बैठे उलटा अपनों पर ही अज़ाब (कष्ट) बन गए। जैसे ख़ुदा ने इनके सपने मे जाकर कहाः “कुछ करने के लायक़ ना सही, माता-पिता के नाफ़रमान ही सही, अच्छे-बुरे की तमीज़ ना सही सिर्फ हथियार चलाना आजाए तुम पक्के मुजाहिद हो।” मारो और मरो, अपनों के ख़ून से ख़ुदा का झंडा लहराओ इस उम्मीद से कि तुम स्वर्गवासी हो जब्कि दुनिया वालों ने देख लिया तुम किस मुसीबत-अज़ाब झीलकर भयानक मौत मारे गए शरीर के हिस्से छेतडों मे उड गए।

कुत्तों ने भोंकते हुए ख़ुदा का पीछा पकडलिया, अब ख़ुदा भी हैरानः बदमाश अपने ख़ुदा को नहीं पहचानते? एक कुत्ते ने दुम हिलाते ख़ुदा से पूछाः आपकी तारीफ़? ख़ुदा ने झिल्लाकर कहाः बदतमीज़! हम तुम्हारे बाप यानी इस सारे संसार के एक अकेले ख़ुदा हैं। कुत्ते ने फिर दुम हिलायाः अच्छा तो आप हैं! दरअसल शक करना फिर भोंकना हमारा सामान्य है। ख़ुदा ने भी अपनी दुम हिलाकर कुत्तों से फ़रमायाः कम्बख़्तों! तुम्हारे मे भोंकने की कला का ये मतलब नहीं कि अपनी मनहूस आवाज़ मे गला फाडो और दूसरों के कान! जब तुम्हारे मे भोंकने की तमीज़ नहीं तो काहे कुत्ता बने फिरते हो?? गली मुहल्ले मे हर आने जाने वालों पर झपटते हो जैसे ये तुम्हारे बाप का इलाक़ा है। ख़ुदा ने कुत्तों को लताडाः तुम आवारा कुत्तों की वजह से आम जनता परेशान हैं, रात को डि्यूटी से लौटने वाले कर्फ़्यू से निकल जाएं मगर कुत्तों की नज़र से नहीं। अकसर लोगों की ईश्वर से प्रार्थना हैः या रब! कुत्तों को वापस बुलाले और उनकी जगह शेर-चीतों को भेजदे। चूंकि शेर को अपने सामने देखकर इंसान की आत्मा फ़ना हो जाती है मगर कुत्तों को सामने देख शरीर कप्कपाता है पाऊँ भारी पडजाते हैं।

ख़ुदा से फ़रियाद हुईः ज़रा टॉम टेंक्रेडो की ज़ुबान पर लगाम दें जिसने इस्लामी पवित्र जगहों पर बम हमलों का फ़त्वा छोडकर मुस्लमानों के भावनाओं को ठेस पहुँचाया है। ख़ुदा ने थंडी आह भरकर जवाब दियाः दुनिया के सभी धार्मिक जनों ने अलग अलग जगहों पर अपने लिए पवित्र मुक़ाम बनालिया है, हिन्दूओं के लिए काशी और मथुरा, मुस्लमानों के लिए मक्का और मदीना जब्कि अमेरिकीयों के लिए ख़ुद अमेरिका एक पवित्र देश है। ज़ाहिर सी बात है जब अलक़ईदा और दूसरे मुल्लाह साहिबान हर दिन अमेरिका पर हमले की धम्कीयां छोडते नहीं थकते अब पहली बार एक उभरते अमेरिकी राष्ट्रपति टॉम टेंक्रेडो के फ़त्वे पर मुस्लमानों के भावनाओं को कैसे ठेस पहुंची? ताजुब है! मुस्लमानों के लिए पवित्र जगह सही मगर अमेरिकीयों का पवित्र देश कुछ नहीं?? ये क्या बात हुई कि मुस्लमान बार बार अमेरिका पर फ़त्वे छोडे… फिर कोई अमेरिकी मक्का-मदीना के ख़िलाफ़ फ़त्वा क्यों ना दे??? ख़ुदा ने पूरे ग़ज़ब मे फ़रमायाः ज़रूरत इस बात की है कि कोई किसी के ख़िलाफ़ फ़त्वे ना छोडे बल्कि आपस मे इंसानियत के साथ मिलजुल कर भाईचारे से रहे एकदूसरे के धर्म / कल्चर की इज़्ज़त करे… यक़ीन जानो फिर किसी के भभावना घायल ना होंगे।

बेकार बैठने कि बजाए ख़ुदा ने अपनी जेब से मणकों का रुद्राक्ष निकाल ख़ुद अपनी तारीफ आप चालू हो गया, किसी ने बताया मणकों मे ख़ुदा का पाठ करने से स्वर्ग मे मुफ़्त इन्ट्री मिलेगी। फिर ख़ुदा को याद आया स्वर्ग तो इसका अपना है फिर काहेके लिए जपना? लोग भी अजीबवग़रीब बातों पर यक़ीन करजाते हैं गणन्त मे ख़ुदा पर श्लोक करते हैं। स्वर्ग ख़ुदा का अपना ज़ाती मकान है, भला कोई इंसान ईश्वर का नाम जपले तो ख़ुदा क्यों उसको अपने स्वर्ग बुलाए? पता नहीं किस कम्बख़्त ने ये अफ़वाह उडाई थी कि ख़ुदा का पाठ करो और स्वर्ग मे मुफ़्त इन्ट्री मारो!! ख़ुदा को ख़ुदा की कसम! तुम इंसानों के हर अच्छे बुरे कर्मों का फल यहीं दुनिया मे मौजूद है लाल मस्जिद ताज़ा मिसाल है। ख़ुदा ने कहाः अब चूंकि रमज़ान का पवित्र महीना आगया जब्कि हमें भूका रहने की आदत नहीं और जिसे भूका रहना है शौक़ से रहले मगर अपनी झूटी पूजा से ख़ुदा का दिल जीतने की कोशिश ना करे, और अगर ख़ुदा को ख़ुश करना ही है तो तुम सभी इंसान आपस मे एकदसूरे की इज़्ज़त करे एकदूसरे के धर्म कल्चर का मज़ाक ना उडाए। ख़ुदा ने फ़रमायाः हमारी भी इच्छा थी कि रमज़ान के पूरे रोज़े रखे लेकिन ऐसा कुछ तरीका हो भूके रहे और भूक का आहसास भी ना लगे।

भारत और पाकिस्तान के साठवें स्वतन्त्रता दिवस पर मुबारकबादी देते हुए ख़ुदा ने फ़रमायाः दोनों देशों के लोग स्वतन्त्रता का मतलब छुट्टी से मनाते हैं। आप लोगों को आज़ादी का मतलब नहीं मालूम तो हनीफ़ और नासिर मदनी से पूछो! बेचारे किस्मत के मारे, जेल से आज़ादी नसीब हुई तो जैसे दुबारा जनम पालिए। ख़ुदा ने चिंघाडते हुए कहाः सुबह स्बेरे राष्ट्रीय गान फिर भाषण फिर मिठाई खालेने के बाद पूरा दिन सिर्फ छुट्टी के तौर पर मनाने वालों! बहुत ही ख़ून ख़राबों के बाद ऐसी आज़ादी मिली कि खुल कर सांस लेना नसीब हुआ। भारत को विश्व का सबसे बडा गणतन्त्र देश होने का नाम मिला, यहां सभी भारतीयों को अपनी राए देने का हक़ हासिल हुआ। अगरचे पाकिस्तानी जनता आज भी अपने जनरलों और मुल्लाओं की ग़ुलामी से आज़ाद ना हुए बावजूद फिर भी ख़ुदको पाकिस्तानी कहलाने पर गर्व महसूस करते हैं। ख़ुदा ने फ़रमायाः आज़ादी दिलवाने वालों को याद करो और उनका शुक्र आदा करो कि इन्ही की वजह ग़ुलामी से आज़ादी मिली, हक़ मांगने की जुर्रात हुई, दुनिया भर मे अलग पहचान बनी। ख़ुदा ने कहाः भारत और पाकिस्तान मे जिन लोगों को अपनी स्वतन्त्रता की क़दर नहीं मालूम, उन्हें इस स्वतन्त्रता की साठ्वीं छुट्ठी का दिन मुबारक।

थक हार कर रात को बिस्तर पर अजीबवग़रीब अन्दाज़ मे कर्वटें बदलने के बावजूद ख़ुदा को नींद ना आई। ख़ुदा ने नींद को पुकारा, अपनी जेबें झांका मगर नींद का कोई अतापता नहीं। नींद को बुलाने के वास्ते ख़ुदा ने अपनी उंगलीयों पर एक से लाख तक गणना लिया फिर भी नींद ना आई, अपने सभी हाथों को गणना लिया फिर भी नींद ना आई, अपनी सभी टांगों को कई बार गणना लिया फिर नींद ना आई। एकदम झिल्लाकर बिस्तर से उठने के बाद ख़ुदा ने अख़बार उठाकर सभी ख़बरों को कई बार पढलिया फिर नींद ना आई। गुस्से मे ख़ुदा ने ख़ुदके गाल पर दो चार थप्पड रसीद करलिए कि पूरे 21 पेराग्राफ़ होचुके इतनी थकावट के बावजूद नींद आती क्यों नहीं? यहां तक कि अपनी उंगलीयों पर थूक लगाके अपने शरीर के सारे बालों को गणना लिया फिर भी नींद ना आई। तंग आकर ख़ुदा छत पर चला आया, यहां खुले आस्मान पर चमकते सितारों को देख ख़ुश होकर तारों का गणना शुरू करदी शायद कि नींद आजाए। और थोडी ही देर मे अपना मूंह फाडे जमकर जमाही छोडा तो आंखों मे तारे मुर्झाने लगे। तारों की गणना पूरी ना हुई अलबत्ता ख़ुदा को नींद आगई। जारी

बाक़ी फिर कभी

This entry was posted on Friday, September 14th, 2007 at 9:52 am and is filed under खुदा से मिलो. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

7 comments so far

 1 

भाई शुएब,
अब तुम्हारा लिखा पढने में मज़ा नहीं आ रहा.

तुम्हारा लिखा एक सच होता है - जो सबको पता होता है, मगर फ़िर भी लोग उससे अनजान बनने की कोशिशों में लगे रहते हैं.

तुम्हारे लिखे को पढ कर अफ़सोस होता है - कुछ ना कर पाने का अफ़सोस.

तुम्हारे लिखा पढ कर तरस आता है - उन बड़ों की बुद्धि पर जो सब कुछ समझते हुये भी कुछ समझना नहीं चाहते.

हम सब एक कल्पना में जी रहे हैं कि एक दिन तो ये जिहाद खत्म होगा, सब तरफ़ अमन शांति होगी, हिन्दू-मुस्लिम हिलमिल कर रहेंगे. मगर बार बार यही महसूस होता है कि “हाँ यह कल्पना और ख्वाब ही है”.

और हाँ, हममें से कुछ लोग इसी काम में लगे रहते हैं कि ये एक ख्वाब ही रहे. आखिर उन्हें भी तो अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ करनी होती है ना…!!

कुछ और लिखो यार….

September 14th, 2007 at 1:39 pm
 2 

ऐसा क्यों है कि हमारी सोच सिर्फ़ हम तक ही सीमित होकर रह जाती है , काश वह दिन आये जब लोग-बाग मजहब की दीवारों से ऊपर उठ कर इन्सानियत की बात सोचें । लेकिन यह कभी न होगा क्योंकि तंग दिल ९९% हैं और खुले दिल मात्र १ फ़ीसदी । और यह इसलिये भी ,

” धार्मिक होना आसान है मगर धर्म को सम्झना किसी माई के लाल मे हिम्मत नहीं। और जिसने धर्म को पहचानलिया वो धार्मिक नहीं बल्कि सच्चा इंसान है।”

September 14th, 2007 at 3:26 pm
 3 

धर्म की शुरूआत दंगों से हुई, आज भी दंगों पर चल रहे हैं और इसका अंत भयानक दंगों पर होगा

इतना सच, इतना नंगा सच, इतना क्रूर नंगा सच….दोस्‍त कई लोगों को हजम नहीं होगा

शुक्रिया

September 14th, 2007 at 4:28 pm
 4 

यार शुएब क्या खाकर लिखते हो, आपकी कल्पनाएँ कहाँ से कहाँ जाती हैं। मजा आ जाता है। :)

इतने गम्भीर मसलों को हास्य के साथ प्रस्तुत करने का आपका अँदाज निराला है।

September 15th, 2007 at 4:27 am
 5 

शुएब भाई, आपने किस फुर्सत से और कितने मन से लिखा है, यह आपके फीचर में झलकता है। आपने जिस धारदार तरीके से अपनी बात कही है, वह सीधे दिल पर असर करती है।
खुदा से यही दुआ है कि आपकी बातें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे, ताकि वे सच को समझने की तौफीक पा सकें। आमीन।

September 15th, 2007 at 2:12 pm
 6 

another masterpiece.
ghughutibasuti

September 17th, 2007 at 2:17 pm
 7 

आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

September 24th, 2007 at 3:20 pm

One Trackback/Ping

  1. नई बातें / नई सोच » ख़ुदा को दांत नहीं!    Nov 26 2007 / 10am:

    [...] ख़ुदा ने बेनज़ीर के बारे कहाः मेडम बडी पटाख़ा ख़ातून हैं, अपनी आमद पर ख़ुद ही भयानक धमाका करके चुपचाप निकल पडी। ख़ुदा ने कहाः हम ने पिछली किश्त मे कहा था कि चंद ख़ुद्दारों की वजे से पूरा पाकिस्तान बर्बाद होने के क़रीब है, पाकिस्तानी जनता को कुचलने के लिए किसी बाहरी ताक़त की ज़रूरत नहीं चूंकि इन्हे आपस मे सलाह करने की भी फ़ुर्सत नहीं। [...]

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