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Oct

वीरान बालकोनी

   Posted by: शुऐब   in ये ज़िनदगी

रोज़ाना आज भी सुबह बालकोनी पर खड़े अंगडाई लेने ही वाले थे कि याद आया सामने ख़ूबसूरत पड़ोसन कल ही किसी और जगह नया फ़्लैट ख़रीदकर शिफ़ट होगए। वैसे पिछले दो वर्शों से बाकाईदा सुबह ठीक समय पर अंगडाई लेने हम अपनी बालकोनी पर तैयार रहते कि आजसे अपने बिसतर पर ही अंगडाई खींचनी पडेगी।

दो वर्श पहले जब उनहोंने पहली बार अपनी सामने वाली बालकोनी पे आकर सुबह अंगडाई खींचने केलिए बाहें फैलाई ही थी कि हम दोनों की नज़रें टकरा गई। उनहोने अंगडाई लेने केलिए अपने हाथ उठाए ही थे कि हमको देख शर्माके हाथ नीचे छोड दिए। फिर उसके बाद हमने ख़ाम्ख़ा रोज़ सुबह अंगडाई लेने बालकोनी पर चले आते और वो हमको छुपके देखते थे। इस छुपाछुपी मे बडा मज़ा आता था। आज सामने वाली बालकोनी वीरान है, अब हम तभी अंगडाई लेंगे जब अपने सामने वाली बालकोनी पे कोई एक नया ख़ूबसूरत पडोस आ

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3 comments so far

 1 

बहुत खूब! दुआ है अंगड़ाइयों का लेन-देन जल्द शुरू हो!

October 3rd, 2009 at 11:05 am
 2 

अब अंगड़ाई लेना भी कोई लेना बचा है. खुदा करे अंगड़ाई लेने के बहाने देखने-दिखाने का मौका जल्द मिले.
आपसे सहानुभुति है. जल्द ही सामने वाली बाल्कनी गुलजार होगी….

October 3rd, 2009 at 12:30 pm
 3 

खुदा करे जल्द ही फिर से अंगड़ाई ऍक्सचेंज प्रोग्राम फिर से चालू हो और आगे भी कुछ प्रोग्रेस हो।
एक बार अपने पुराने स्कूल में एक खूबसूरत मैडम चली गई थी तो हमने भी लाइब्रेरी की बजाय अपनी लैब में ही चाय पीना शुरू कर दिया था :)

October 4th, 2009 at 3:25 am

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