हमारे सीनियर चिट्ठाकार जो मुझे जानते हैं यही राए देंगे कि पहली फ़ुरसत मे विवाह करलो। हालात भी कुछ ऐसे हैं कि मेरी हालत को देख शादीशुदा बुज़र्ग यही कहेंगे। सुबह घर से आफ़िस केलिए निकला था। और जब आफ़िस के बिलकुल क़रीब पहुंचा तो सामने एक बुलडोज़र खुदाई मे मसरूफ़ (व्यस्त) है जिसको रोकने वाला कोई नहीं। और ट्राफ़िक पुलिस वाले अपने हाथ के इशारों से वाहनों को दूसरी तरफ मोड रहे थे। अब यहां से अपना आफ़िस सिर्फ एक मिनट की दूरी पर था। सामने खुदाई की वजह से (वैसे अपना बैंगलूर शहर खुदाई के लिए बहुत मशहूर है - पहले एयरटेल फिर बीएसएनएल और उसके बाद लाइन मे रिलायंस, वुडाफ़ोन, एयरसेल, आईडिया और टाटा के बाद बाईबाई आदी) ये सभी कम्पनीयां बारी बारी खुदाई मे व्यस्त रहती हैं। ऐसा हुआ कि सिर्फ एक मिनट का रासता जो था, बहुत दूर तक सिगनल से दाहिने ओर फिर दाहिने (कहीं से भी शार्टकट नहीं) अपनी बाईक को मोडते हुए अपने ही ख़यालों मे।
क्या मेरी तरह और भी लोग ख़यालों मे खोए रहते हैं? सामने किसी नेता की कारों का कारवां था। ट्राफीक इंस्पेक्टर ने सभी वाहनों को रोक कर नेताजी के कारवां को हरी झंडी क्या दिखाई कि मैं अपने ख़यालों मे खोगया जैसा कि अकसर खोजाता हूं। मैं ख़ुद नेता, मेरे लिए ट्राफ़िक रोकदी है, सभी लोग मुझे हैरत से देख रहे या फिर देखने की आशा मे हैं। नेता का कारवां तो चला गया और ट्राफिक सिगनल भी खुल गया मगर मुझे होश तब आया जब पीछे वाली वाहनों ने हॉर्न बजाया और एक ने मेरे मूंह पर ही बोल दिया कि “भाई, अपनी बाईक आगे निकाल, फिर मनही मन वो बड़बडाते हुए चला गया “पता नहीं कैसे कैसे लोग हैं कि सिगनल पर भी सोजाते हैं”!!!!
अपनी बाईक तो आगे निकाला फिर क्या देखता हूं कि एख बढिया सी कार मे जवान लड़का और साथ मे खूबसूरत लड़की साथ जा रहे हैं और फिर क्या? फिर ख़यालों मे खोगया। लड़के को हटाकर मैं उसकी जगह आगया, बढिया कार और ख़ूबसूरत लड़की दोनों मेरे। कुछ देर बाद कुछ-कुछ होश आया - वही सड़क, वही नज़ारे, वही साईन बोर्डस, वही दुकानें सब कुछ वही जो कुछ देर पहले देखा था। जब राम प्यारे पूरी तरह होश मे आचुके तो, भैया वापस अपने ही घर की ओर जहां से निकले थे।
ख़ुदको गालीयां देना अच्छी बात नहीं, वैसे अच्छी-२ गालीयां अच्छी तरह जानता हूं। अब क्या करता? फिर बाईक को घुमाया और पूरे ३५ मिंटों का रास्ता तैय करते आफ़िस पहुंचा वहीं से जहां पर बुलडोज़र खुदाई कर रहा था। हमारे दफ़्तर मे एक मुसलिम ख़ातून (महिला) इनका नाम “हिना” है भी नौकरी करती हैं, मुझे देखते ही झटसे पूछी कि शुऐब क्या तुमने आजका अख़बार पढ़ा? मैं ने जवाब मे बोला कि नहीं मैं अख़बार पढ़ता नहीं बल्कि देखता हूं। तो हिना ने कहा आजका अख़बार ज़रूर पढ़ो क्योंकि देव्बंद के मुफ़्त-ख़ोरों (मुफ़्ती साहिबान) ने फ़त्वा जारी किया है कि मुसलिम महिला को नौकरी नहीं करना है और तो और इसकी कमाई को हराम क़रार दिया!!! ये सुनकर मैं ने हिना से कहा (जिसको मैं दीदी पुकारता हूं) तो दीदी जब तुमने अख़बार मे ये फ़त्वा पढ़लिया तो फिर काम पे क्यूं आई? इतना सुनते ही वो मुझे खाजाने वाली नज़रों से देखी जैसा कि मैं ने फ़त्वा जारी किया था। ये रही आजकी कहानी।
होसकता है ठाकरेजी स्वर्गवास होगए, वरना अबतक आमना, सामना और दूसरे रोज़नामा का पहला पन्ना अपने बयानों से काला करडालते कि शुएब और सानिया की शादी मे अलक़ाईदा या तालीबान का पक्का हाथ है। इस होने वाली शादी को लेकर मीडिया वालों ने ऐसा भांगडा डाला कि अब तो उबामा को भी इस पोस्ट पर टिप्पणी देनी लाज़िम होजाए। वैसे भारतय जनता पार्टी ने इनकी शादी मे भांगडा डालने अर्ज़ी दाख़िल करदी।
बैठे बिठाए रात गहरी होती जारही है और मैं नैटगिरी करते समाचार वैबसाईट्स देख रहा हूं और सामने टीवी मे अकसर न्यूज़ चैनल पर ऐंकर्स सानीया और शुएब के गुण पढते अपना गला सूखा कर रहे हैं। बोलते हैं कि आईपीएल मे पाकिस्तानी खिलाडीयों को रिजक्ट करदिया तो सानीया ने पूरे भारतिय नौजवानों को रिजेक्ट करदिया। ये टीवी एंकर्स हांपते कांपते सानीया और शुएब के बारे मे ऐसे बोले जा रहे हैं जैसे सुनामी उबलने वाला है या फिर लोकसभा चुनाव का रिज़ल्ट बता रहे हैं।
होने वाली बहू का स्वागत बम धमाकों से करेंगे? कोई भी ताज़ा अख़बार ये ख़बर नहीं देता कि आज पाकिस्तान मे धमाकों की आवाज़ सुनाई नहीं दी!! हर दिन लोडशेदिंनग झेलने के साथ रोटी पकाने आटे केलिए लम्बी क़तार मे खडेगी। पडोस की महीलाओं को बालिवुड के किस्से कहानीयां सुनाकर उनको ख़ुश रखेगी वैसे भी पाकिस्तानीयों केलिए बालिवुड के किस्से ब्रेकफ़ास्ट, लंच और डिन्नर तो दूर की बात इबादत से भी ज़्यादा पवित्तर हैं।
दयोबंद के मुल्ला लोग भी ख़ामोश हैं वरना ऐसे मौक़े पर सबसे पहले इनही को खुजली शुरू होनी थी कि भारतय जनता पार्टी ने उनकी पीठ मुफ़्त मे खुजाडाली। सच्ची बात ये है कि उन दोनों की शादी मे किसी को भी दिलचस्पी नहीं लेकिन मीडिया वालों के। कुछ तो बताना है कुछ तो दिखाना है और बकवास बोलना है ख़ामव्ख़ा चौबीस घंटों का चैनल जो खोल रखा है। आम आदमी को खुदकी पडी है, ये कौनसा सानीया और शुएब मलिक की जोडी पर अपना सर खपाएं। महीने बीत गए अलक़ाईदा और तालीबान पर कोई पोस्ट लिखा नहीं। हर काम, बात, ख़बर, हादसा वगैरह मे इनकी टांग खींचना फ़ैशन है तो ये पोस्ट भी अलक़ाईदा और तालीबान के नाम है।
Note: याद रहे कि मेरा नाम शुऐब s h u a i b है ना की शुएब s h o a i b.
बस मे ट्रेन मे विमान मे या जहां कहीं भी कोई नया मिलजाए, स्लाम नमस्ते के बाद बात चीत शुरू होती है फिर नाम पूछते हैं तो जवाब मे बोलता हूं कि मेरा नाम शुऐब है तो वापस बोलते हैं - ओह आप मुसल्मान हो?
मेरे दिल मे एक ही उत्तर ग़ुस्से मे निकलता है “तेरी मां की………. तेरी बेहन की……….
मेरे पेट पर घूंसा मारो, पीठ पर लात मारो लेकिन उस्से भी ज़्यादा ग़ुस्सा मुझे तब आता है जब कोई मुझसे मेरा धर्म पूछता है। लगता है जैसे मेरी मां बेहन को गाली दे रहा है। मैं इंसान हूं और भारतवासी।
आपसे बिनती है कि यात्रा मे या कहीं भी अजनबीयों से उनका धर्म न पूछें न अपना धर्म बताएं वरना बात चीत और नई दोस्ती का अच्छा मूड़ कहां से कहीं और निकलजाता है। ये नया ज़माना है, हम सभी को साथ मिलकर रहना है।
भारत और पाकिस्तान के उर्दू अख़बार बडे कमाल के हैं कि कभी मरने नहीं दिया फ़िलिस्तीनीयों को सिवाए शहीद होने के। बेचारे फ़िलिस्तीनीयों को घर बिठाए ही शहीद करवादेते हैं चाहे वो ताश खेल रहे हों, नहा रहे हों, हुक़्का और दारू पी रहे हों कि अचानक मौत आगई और उर्दू अख़बारों मे ये शहीद होगए।
दुःख की बात है, मरने वाले फ़िलिस्तीनीयों मे छोटे बच्चे भी होते हैं गली मुहल्ले मे खेल रहे होते हैं और इन्की किसी से दुश्मनी भी नहीं कि यूं हंसते खेलते शरीर के छेतड़े उड़जाते हैं। माताओं का बिलबिलाना, हर ओर चीख़वपुकार और इंतेक़ाम के जज़बात…. हात्थों मे क़ुरान लिए जलूस और जलसे। शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिसदिन फ़िलिस्तीनीयों ने जलूस ना निकाला।
जज़बात मे शर्शार ये फ़िलिस्तीनी अपनी जेब मे बम रखे इज़राइलीयों पर कूद पड़ते हैं जिसे वो ‘इंतेक़ाम’ या फिर ‘जिहाद’ का नाम देते हैं। और इज़राइल अपनी जवाबी कार्वाई करे तो मरने वाले फ़िलिस्तीनीयों को उर्दू अख़बार ‘शहीद’ का नाम देते हैं…. सच है, अपने देश केलिए लड़ने मरने वाले शहीद ही कहलाते हैं। वैसे भी इज़राइल मुसल्मानों की आंखों मे कांटा है।
मेरे विचार मे फ़िलिस्तीन और इज़राइल मे कोई जंग जैसी बात नहीं सिवाए छेड़छाड़ के। क्योंकि अगर इज़राइल चाहे तो सिर्फ़ एक मिनट मे फ़िलिस्तीनी राज्य को हिलाकर रखदे मगर बाद मे दुनिया को जवाब देने के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं सिवाए शर्मींदा होने के। वर्षों की इस आपसी छेड़छाड़ मे कई फ़िलिस्तीनी और इज़राइली मरचुके हैं या फिर शहीद होगए।
अगर फ़िलिस्तीनी हक़ पर होते तो आज इज़राइलीयों की टांगें तोड़ ख़ुद उन्ही के हात्थों मे थमा देते…. लेकिन ये इतने कमज़ोर और लाचार हैं कि बेचारों को आजतक मेहनत मज़दूरी करना नहीं पता। दुनिया भरसे ख़ैरात पर पलने वाले फ़िलिस्तीनी यहां तक कि इनकी सरकार और पुलिस को भी ख़ैरात मे मिलने वाले पैसों से तंखा मिलती है। ख़ुद भारत सरकार ने कई बार अनाज के साथ लाखों रूपय ख़ैरात मे दिए थे।
फ़िलिस्तीनीयों को अपने पैरों पर खड़े होने की ताक़त नहीं कि ताक़त्वर देश इज़राइल से ‘ऐलान-ए-जिहाद’ का नारा लगाकर दुनिया भरके मुस्लिम देशों से हमदर्दी हासिल करना चाहते हैं…. सच बात ये है कि सिर्फ़ मुसल्मान ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी ज़ात वाले फ़िलिस्तीनीयों से हमदर्दी रखते हैं क्योंकि ये एक लाचार क़ौम है, तभी तो ग़ैर मुस्लिम देश भी फ़िलिस्तीन को ख़ैरात भेजते हैं।
कमज़ोर को और ज़्यादा कमज़ोर बनाने के लिए दुनिया भर से ख़ैरात भेजी जारही है मगर किसी मे इज़राइल को रोकने की हिम्मत नहीं। सारी दुनिया जानती है कि फ़िलिस्तीन और इज़राइल के बेच क्या चक्कर है….. मेरी नज़र मे सच ये है कि फ़िलिस्तीनी अपने ही घरों से बेघर होगए, ऐशवआराम केलिए दुबई मे अपनी पत्नीयों बेटीयों को बेच खागए और आख़िर मे ख़ुद भी बिकाऊ होगए। अब इनके पास कुछ नहीं सिवाए ‘जिहाद’ का नारा लगाने और बाक़ी दुनिया सर हमदर्दी पाने।