Archive for the ‘ये ज़िनदगी’ Category

ये समीरजी चाँद वाले और चाँद को खिलोना लिखने वाले। ये भी लिख डालते कि चाँद नहीं तो रमज़ान की ईद नहीं। जब चाँद पर इंसान बस जाएंगे तो बच्चे ईद कैसे मनाएंगे?

ये समीरजी, लिखते बहुत हैं और इनपर कई चिट्ठकारों ने काफ़ी कुछ लिखा है मगर ये हंसता मुसकुराता पुरुष कभी किसी का बुरा नहीं मानता चाहे इनपर कुछ भी लिखो। बाक़ईदा हिन्दी चिट्ठों की पोस्ट पर “बढीया” टीप आते हैं और बदले मे अपने ख़ुदके चिट्ठे पर दर्जनों टिप्पणीयां पाते हैं। ये लिखते भी ऐसे कि इनकी पोस्ट पढे और टीपे बगैर रहा नहीं जाता। मगर आज…

इनकी एक पोल खोलनी है मुझे। कुछ साल पहले की बात है कि कनाडा से भारत निकले बीच मे दुबई रुकना था इनके रिश्तेदार से मिलने। मेरे मोबाइल पर नामलूम नम्बर की घंटी बजी, दूसरी तरफ़ से मीठी मर्दाना आवाज़ आई “हेलो शुऐब भाई मैं समीर बोल रहा हूं, पहचाना आपने? अरे वही हिन्दी चिट्ठाकार - पहचाना कि नहीं!!!”

मैं ख़ुशी से चहक उठा क्योंकि ये वही हैं जो मेरे चिट्ठे की बकवास पोस्टों पर अपनी टिप्पणी मे “वाह बहुत बढिया” लिखते थे। और ये वही स्वामीजी हैं जिनकि वाह वाह पर मैं और ज्यादा पोस्टें लिखने लगा और आज हिन्दी चिट्ठाकारी मे मेरा नाम तो नहीं मगर कुछ चिट्ठकारों मे एक पहचान बन गया।

बोले कि “शुऐब भाई, मैं समीर लाल उड़न तश्तरी हां वही वही….। मैं केनडा से दुबई होते भारत जा रहा हूं, और अपने रिश्तेदार से मिलने यहां पांच दिन रुकूंगा। क्या आपसे मुलाक़ात होसकती है?”

ज़िन्दगी मे पहली बार एक चिट्ठाकार से मुलाक़ात का मौक़ा मिल रहा है मैं कैसे इंकार करता। मैं ने कहा आज नहीं कल ज़रूर मिलेंगे। क्योंकि मैं डियोटी पर था।

दूसरे दिन फिर अजनबी फ़ोन आया। आवाज़ समीरजी की ही थी। बोले “मैं एयरपोर्ट जा रहा हूं, वापस भारत”
मैं ने समीरजी से पूछा - आप तो मिले बग़ैर ही निकल पडे?

जवाब मे समीरजी ने कहा - “हांजि, माफ़ी चाहता हूं, यहां दुबई की गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही। बहुत नहीं बहुत ज़्यादा गर्मी है यहां। उम्मीद करता हूं फिर कभी ज़रूर मुलाक़ात होगी हमारी”।

लो होगई मुलाक़ात? कितना ख़ुश था कि पहली बार एक हिन्दी चिट्ठाकार से मुलाक़ात होने को है और वो भी अपना पसंदीदा चिट्ठा “उड़न तश्तरी” मिले बगैर उड गए। मगर शुक्र है कि दुबई आकर फ़ोन तो करलिए। मैं तो सिर्फ एक ही हिन्दी चिट्ठाकार से मिला था दुबई मे कुवेत वाले कानपुरी भाई यानी मेरा पन्ना वाले, ये उनसे एक यादगार मुलाक़ात थी क्योंकि मेरे ड्राईवर से गले मिल गए शुऐब समझकर :)  और ये शरारत मेरी ही थी ;) मगर समीरजी बच गए उनके साथ भी कुछ ऐसी ही शरारत का प्लान था। मगर वो दुबई की गर्मी बर्दाश्त ना करते हुए अपनी उड़न तश्तरी से दूसरे ही दिन उड़ गए।

(नोट - ये एक पुरानी याद थी जिसे मैं ने आज पोस्ट किया)

13
May

आजकी कहानी मेरी ज़बानी

   Posted by: शुऐब

3
Oct

वीरान बालकोनी

   Posted by: शुऐब

13
Oct

मैं शहीद हूं

   Posted by: शुऐब