Archive for November, 2006
डिस्को मे पहली बार
यहां जुमेरात की रात ऐसी होती है जैसे दूसरे देशों मे शनिवार होता है। दुबई का मौसम बदला तो सबके पर निकल आए, यहां की गर्मी मे दस कदम चल नही सकते और अब मस्त मौसम मे बगैर पंख के भी उडा जासकता है
गुरूवार की रात पूरे शहर मे रौनक लग जाती है खासकर इन दिनों अब यहां सालाना “दुबई शॉपिंग फेसटिवल” शुरू होचुका है तो हर तरफ ट्राफिक जाम, शॉपिंग सन्टर्स, नाईट कलब्स, डिस्को, टैक्सी और बस हर जगह आदमी पर आदमी खडा हुआ - यहां तक कि पब्लिक टाईलेट जाऐं तो वहां पहले से पठानों की लाईन लगी रहती है। इस वक्त वर्लड शॉपिंग मेले की वजह से पूरे शहर को दुलहन की तरह सजा दिया है।
जुमेरात की रात हम पूरे आठ मित्र मौसम का मज़ा लूटने दुबई की सडकों पर सडक छाप की तरह उतर आए इस लिए कि यहां ऐसा खुशगवार मौसम बार बार नही मिलता मौके का फाईदा उठाना ज़रूरी है क्योंकि फिर सात महीने ज़बरदस्त गर्मी झीलना पडता है। यहां शॉपिंग फेसटिवल के मौके पर दुनिया भर से लाखों लोग विज़िट करते हैं। इस छोटे से शहर मे दुनिया के हर एक देश के लोग होते हैं तो ज़ाहिर है हर देश का डिस्को भी हो। शहर मे हर किसम के डिस्को हैं अमीरों के गरीबों के बच्चों के बडों के मतलब हर साईज़ मे डिस्को देखने को मिलते हैं मगर मजाल है जो मैं ने कभी डिस्को मे कदम रखा हो लेकिन आज सर के बल डिस्को पहुंच गया
डिस्को मे घुसने का पास खरीदने गए तो अजब ही आफर है लडकी साथ हो तो ज़बरदस्त डिसकॉऊंट भी है - कितनी बेशर्मी की बात है हम पूरे आठ मित्र मगर एक भी लडकी साथ नही लानत है हमारी ज़िन्दगी पर। लाईफ मे पहली बार अपना पाक कदम डिस्को मे रखा - ऐ खुदा मुझे माफ कर - मगर ये क्या? खुदा खुद डिस्को मे नाच रहा है।
बाकी मित्रों को डिस्को का ऐसा तजुर्बा है कि जैसे ये उनका दूसरा घर हो, मगर मैं अनाडी अंदर घुस्ते ही अंधेरे मे लोगों को धक्का मारते ठोकरें खाते जैसे भूकंप आगया हो, चारों तरफ बडे बडे सपीकरों पर ज़ोरदार म्युज़िक - समझ मे नही आ रहा कि कहां जाकर क्या करना है। थोडा आगे बढा तो एक मोटी सी औरत ने मुझे ऐसा धक्का मारा कि सामने रोमांस चल रहे एक टेबल पर जा गिरा और उनका दारू पानी गिरा दिया मगर वो बेचारे मुझे डांटने कि बजाए अपना रोमांस जारी रखे थे। गाने बजाने का ऐसा शोर कि मैं अपने मित्रों को आवाज़ दे रहा हूं मगर इस शोर मे मुझे अपनी आवाज़ भी सुनाई नही दी। क्या परेशानी है कहां बैठूं खडे होने की भी जगह नही और हमारे ये दोस्त जो मुझे साथ लाए थे पता नही अंधेरे मे कहां गायब हो गए।
अंधेरे मे एक आदमी की शकल पर थोडी शराफत देखा तो उस से पूछा कि भाई ये बाहर जाने का दर्वाज़ा किधर है? उस ने कहाः इतनी ज्लदी क्या है अभी तो आए हैं। मैं परेशान कि इसको कैसे पता हम अभी आए हैं - थोडा गौर से देखा तो वो अपना ही मित्र था फिर अपनी जान मे जान आई। थोडी देर बाद अब कुछ कुछ नज़र आने लगा, पूरा डिस्को लोगों से भरा हुआ था यहां अंग्रेज़, अफ्रिकी, भारती और अरबी हर टाईप के लोग नाच रहे थे जैसे एक दूसरे को धक्का दे रहे हों। पहली बार डिस्को आया हूं तो थोडा शर्मा रहा था, इनसानियत और भारती होना भी एक चीज़ होती है इसलिए अदब से खडा था तो अपने एक दोस्त ने डांटाः अरे ऐसे क्या खडे हो, ये स्कूल नही डिस्को है।
कैसे कैसे लोग आए हैं यहां, मुझे लोगों के चेहरे पढना आता है सिर्फ चेहरा देख कर अंदाज़ा करलेता हूं कि कौन किस टाईप का है। ऐसे भी लोग आए हैं जिनके चेहरे पर साफ लिखा है की वे बहुत बडे कमीने हैं और ऐसे भी आए थे जिनके चेहरे से शराफत टपक रही थी। जवान तो जवान बुज़र्ग लोग भी तशरीफ फर्मा थे और उनके साथ कम उम्र की लडकीयां बिलकुल बीटी या पोती जैसी मगर उनकी हरकतें ऐसी कि इन पाक रिश्तों का नाम नही दे सकते। ऐसे भी लोग आए थे जिन्हें लोग सलाम करते हैं इज़्ज़त देते हैं शरीफ आदमी समझते हैं मगर किसी को ये नही मालूम कि वो इस वक्त डिस्को मे हैं।
यहां डिस्को मे हर एक देश की लडकियां थीं हिन्दी बोलने वाली, रश्यन, चीनी, फिलपैन आदी - मैं समझा कि ये भी हमारी तरह आई होंगी मगर उनके कपडों और हरकतों से साफ झलक रहा था कि उनकी नियत क्या है। एक बहुत ही खूबसूरत लडकी मेरे करीब आई तो दिल बाग बाग होगया फिर उसके बाद और दो लडकियां आईं तो पहली बार मेहसूस हुआ कि मुझ पर भी लडकियां मरती हैं। एक लडकी से बहुत देर तक मीठी मीठी प्यार भरी बातें हुईं जब वो काम की बात पर आई तो मेरे पैर कांप उठे (नही चाहिए ये बीमारी)
रात एक बजे के बाद डिस्को मे खडे होने की भी जगह नही, बारी बारी अंग्रेज़ी और हिन्दी रीमिक्स की धुनों पर लोग बे तहाशा नाच रहे थे ऐसा लग रहा था किसी को दुनिया की ज़रा भी खबर नही हर एक अपने आप मे मस्त था। उनके चेहरों से लग रहा है कि वो सब यहां खूशी मनाने और मौज करने आए हैं बस और कुछ नही। हर टाईप के लोग हिन्दू मुस्लमान सिख ईसाई और हर तरह के लोग शरीफ कमीने मासूम दिखने वाले लम्बी दाढी वाले, अमीर और गरीब मतलब एक हमाम मे दुनिया की हर कौम के लोग नाच रहे थे।
पहली बार डिस्को आकर मुझे जो शर्म और डर मेहसूस हआ मगर अब सोच रहा हूं कि यहां हर टाईप के लोग आए हैं जो अपने धर्म ज़ात और ईमान को साईड मे रख कर थोडी देर के लिए सब एक साथ खुशी मे नाच रहे हैं मगर यही लोग डिस्को से बाहर निकलने के बाद शरीफ इनसान होने का नटक क्यों करते हैं। मसजिद मे हिन्दू नही आसकते और मंदिर मे मुस्लमानों का दाखिला नही मगर ये डिस्को हर एक को खुश आमदीद करता है यहां अंदर किसी के साथ भेद भाव नही यहां सब एक हैं। दुनिया वालों के सामने सबसे अच्छा इनसान होने का नाटक और यहां डिस्को के अंदर जानवर होने का नाटक, कितनी अजीब ज़हनियत है हम इनसानों मे, पता नही हम अपने आप को धोका देते हैं या दुनिया वालों को????