Archive for April, 2007

21
Apr

हेंड्स अप

   Posted by: शुऐब    in ये ज़िनदगी

आज अपना चिट्ठा खोला तो चोंक पडा, इतनी सारी प्यार भरी टिप्पणीयां देख ऐसी अपनाइयत मेहसूस हुई जैसा कि मैं आप हिन्दी चिट्ठाकारों के घर मेहमान आया हूं।

वर्षों बाद अपने देश आया, प्लेन से उतरते ही सोचा कि अपने वतन की मिट्टी को चूमलूं। फिर लगा कि लोग मुझे पागल समझेंगे - वैसे अपने देश से मुहब्बत मेरे दिल मे है, लोगों के सामने क्यों शो करूं?

दुबई की ज़बर्दस्त गरमी से निजात मिली, वाह अपने शहर बेंगलूर का मौसम - अब अपने शहर की तारीफ किस मूंह से करूं?  हर एक को अपना शहर अपना गाऊँ सबसे प्यारा होता है। बेंगलूर हवाई अड्डे पर उतरा ज़बर्दस्त बारिश ने स्वागत किया, हर तरफ थंडी हवाएं चल रही थीं - मन कर रहा था टैक्डी से उतरकर नाचूं झूमूं।

घर मे आधी रात तक मेरे लाए हुए तुहफों पर छीना झपटी होने लगी, बादाम, चॉकलेट पूरे घर मे बिखरे हुए और छोटे बच्चे अपने खिलोने पाकर ख़ुशी मे चींपां चीपां बजाना शुरू करदिया। वर्षों बाद अपनी आंखों के सामने अम्मी अब्बा, भाई बेहनों को मुसकुराते देखकर मेरी भूक उड गई वैसे रास्ता भर जोरों की भूक लग रही थी।

घर का कमप्यूटर - तौबा, कीबोर्ड पर जैसे हथोडा मारा हो, बगैर बॉल का माऊज़, डस्क-टॉप पर गेम्स के आईकॉन जैसे कचरा। घर मे लेंड-लाईन का नाम ही नहीं अब तो हर एक के पास मोबाइल है यहां तक कि मेरा लाया हुआ अपना मोबाइल फोन भी छोटे भाई ने छीन लिया और अपना पुराना वाला मुझे थमा दिया।

दूसरे दिन अम्मी ने मेरा हेंड-बैग चेक किया - मेरा पासपोर्ट निकाला, वहीं पास बैठी छोटी बेहन ने गवाही दी किः हां यही है विदेश जाने की कुंजी - और अम्मी ने मेरा पासपोर्ट अपने क़बज़े मे करलिया इस धमकी के साथ किः खबरदार, बस बहुत हो गया, अब शुऐब विदेश नहीं जाएगा। और मैं अम्मी के आगे हेंड्स-अप हो गया।

दो महीनों की छुट्टी पर आया हूं, बाद मे कुछ बहाना करके अम्मी से अपना पासपोर्ट लेलूंगा, वैसे मुझे मालूम है कि वो कहां क्या छुपाती हैं। तीसरे ही दिन मैं ने एक नई Honda Activa ख़रीदली, ताकि भागमदौड करके कुछ जॉब ढूंडलूं मुझे बेकार बैठना नहीं आता, सोच रहा हूं कि फिलहाल कॉल सेन्टर मे ही घुस पडूं मगर अभी तक इसका कोई लिंक नहीं मिला - औ हमारे जीतू भाई का भी मश्कूर हूं जो मेरी मदद कर रहे हैं और सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को मैं हार्दिक धन्यवाद कहूंगा आपकी प्यार भरी टिप्पणीयां पढकर दिल भर आया और सोच रहा हूं कि वापस दुबई ना ही जाऊँ तो अच्छा है :P यारों क्या ज़बर्दस्त दावतें चल रही हैं और एक तो अम्मी के हाथ के बने पकवान आहह ज़मानों बाद देसी स्वाद मिला है वैसे भी मैं खानों का बहुत शौकीन हूं मुझ मे दूसरा कोई शौक़ नहीं है।

3
Apr

रात का खेल

   Posted by: शुऐब    in दुबई, ये ज़िनदगी