Archive for January, 2009
स्कूल-डे (भाग तीन)
क्लासरूम की ज़ीनत बढ़ाने केलिए ख़ुदा ने प्रधान अध्यापक श्रीमती ज़ीनत को बुलाया और शिकायत करदी - बड़े अजीब किसम के बच्चे हैं, हम पढ़ा रहे हैं और यहां देखें सब मूंह खोले सो रहे हैं।
श्रीमती ज़ीनत ने ख़ुदा से कहा - आप बच्चों को कुछ ऐसा पढ़ाएं कि वे जाग उठें मगर वैसा ना पढ़ाएं कि बच्चे सोजाएं।
ख़ुदा ने कहा - तब तो ठीक है, हम बच्चों को काला जादू बताएंगे कि ये जाग उठें।
भयानक खांसते हुए ख़ुदा ने बच्चों को जगाया फिर अपनी जेब से जादुई डंडा निकाला।
तो बच्चो, ये है जादू का डंडा। इसको ज़रा घुमाया, देखो हम ओबामा बनगए फिर ये देखो उसामा भी बनगए। अब हम डायनासोर के रूप मे आते हैं….
सब बच्चों ने एक-चीख़ होकर बोला - बस रुक जाएं। अगर होसके तो अपने जादुई डंडे से हमारे हिसाब की टीचर को ग़ायब करदें वे बहुत दिमाग़ खाती हैं।
मूड बनाने केलिए ख़ुदा ने बच्चों से पूछा - जब तुम बडे होंगे तो क्या बनोगे?
सब बच्चों ने एक आवाज़ मे कहा - अमीर होंगे। फिर कार ख़रीदेंगे उसके बाद डिसको जाएंगे।
ख़ुदा ने बच्चों से कहा - फिर श्रीराम सेना के डंडे भी खाएंगे। है ना।
एक बच्ची ने ख़ुदा से पूछा - जब आप बच्चे थे तब बड़े होकर क्या होने की सोचते थे?
ख़ुदा ने बताया - हम……. सोचते सोचते पागल होगए थे फिर अचानक ख़याल आया तो झटसे ख़ुदा बनगए।
ख़ुदा ने कहा - आओ बच्चो, हमसब मिलकर प्रार्थना करते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन ज्लदी स्वस्थ हों।
एक बच्चे ने तुरंत कहा - रितिक अंकल केलिए भी प्रार्थना करें, वे एक फ़िल्म की शूटिंग के समय ज़ख़्मी होगए बेचारे।
फ़िलिस्तीन मे शहीद बच्चों की फ़ोटो दिखाकर रोते हुए ख़ुदा ने कहा - इज़राइल ने अच्छा काम करदिया, इन बच्चों को बचपन मे ही मारडाला…… हे अफ़सोस अगर वो बड़े होजाते तो मुजाहिद होते। जिहाद के नारे लगाकर दुनिया की दूसरी क़ौमों से नफ़रत करते, ख़ैरात के पैसों से हथियार ख़रीदकर तबाहीयां मचाते….. अच्छा है वो फ़िलिस्तीनी बच्चे बचपन मे ही मरगए यानी वे अपनी मासूमियत को क़ायम रखते हुए शहीद होगए। काश… तालिबान, अलक़ाईदा और दूसरे जिहादी ग्रुह के लोग भी बचपन ही मे मरजाते।
एक बच्ची ने ख़ुदा से पूछा - मैं बड़ी होकर क्या डिस्को जासकती हूं?
ख़ुदा ने उत्तर दिया - हां ज़रूर जासकती हो। क्योंकि इस दुनिया मे डिस्को से बढकर और कोई पवित्र स्थान नहीं। जहां ख़ुशीयां हों और मौज-मस्ती भी हो, भला इससे बडी और कौनसी इबादत होसकती है।
डिस्को मे सभी लोग आते हैं जैसे सरकारी ट्रांसपोर्ट मे सब एकसाथ बैठते हैं। सिनेमा हॉल मे भी ऐसा ही है। होटल रेस्टुरेंट मे सभी किसम के लोग आते हैं कोई टोपी पहने कोई पगड़ी, कोई बुर्ख़ा ओढ़े तो कोई डुपट्टा और सारी….. ये आम बात है और आम ज़िन्दगी भी जिसमे बहुत मज़ा है मगर कुछ कट्टर मुस्लमानों और श्रीराम टोला के कुछ लोगों को ये आम बातें और आम ज़िन्दगी समझ नही आती। जारी
बाक़ी फिर कभी
[ ये ख़ुदा है - 72 ]