Archive for July, 2009
हमारी अच्छी क़िस्मत
पता नहीं किसका चेहरा देखकर नींद से जागे थे! सुबह बाहर निकलते फ़क़ीर से ही पाला पड़ना था? बासी मूंह लिए मूंह पर ही शिकायत ठोंका - बड़े नसीबों वाले हैं आप कि यूं बैठे बिठाए ख़ुदा बन बैठे और हमें देखो जनमसे भिखारी। पता नहीं कौनसी जड़ीबोटीयां खालिए थे कि खुद ख़ुदा होगए, ज़रा नुसख़ा तो बताओ उम्र के इस आख़िरी समय मे हम भी कुछ ख़ुदागिरी करलेते।
हमारी अच्छी क़िस्मत कि हम ख़ुदा बन बैठे मगर क़िस्मत चमकाने मे बहुत महनत चाहिए, लोगों की गालीयां, काफ़िर होने के फ़त्वे, दिल जलाने के बहाने। अगर तुम भी मेहनती होते तो आज भिख़ारी ना होते माइकल जैकसन होते, तुमहारी मृत्यु पर हज़ारों मातम करते फिर लम्बी सी मज़ार बनाकर तुमपे ही चढ़लेते।
पूछते हैं कि मेरा वोट किधर गया? हमारे ख़ुदा होने का ये सिला अब इसका भी उत्तर दें! नज़्ज़ाद ने खालिया और मौस्वी से हज़म ना हुआ। दोनों पेटभरे एक दिहाती दूसरा शहरी। अगर पूछते कि हमारी स्वतंत्रता का क्या हुआ? ज़माने से कट्टर मज़हब मे फंसने वाले इतना ज्लदी कैसे आज़ाद हों? बेचारे उच्च समाज ईरानी क़ौम धर्म से बेज़ार जो बाक़ी दुनिया के साथ क़दम मिलाना चाहते हैं, अब नज़्ज़ाद की अर्थी का इंतेज़ार करते हैं।
एक नाचने वाले के इतने दीवाने? हालांकि हम ख़ुदा ठेहरे फिर भी अजतक हमको कोई पूछने वाला नहीं। हे अफ़सोस हमें भी नाचना आता और ज़रासा ठुमका लगाकर हज़ारों को अपना मुरीद बना डालते। सलाम है उसपर जिसने धार्मिक नफ़रतों के बाव्जूद कई लोगों को अपना दीवाना बनालिया और अपनी अदाओं से इंसानों का दिल जीतकर ऐसी मशहूरी पाई कि ख़ुदा को भी पीछे छोडदिया।
चीन के जियांग शांग मे मुस्लिम फ़साद। मियां, कोई नई बात करो। जहां मुस्लमान वहां दंगाफ़साद ना हो? अब चलते हैं लालगढ़, मगर ये लाल मसजिद वाले पूछते हैं कि लालगढ़ और लाल मसजिद मे क्या अंतर है? मियां सिम्पल है कि लाल मसजिद वाले धर्म के वासते जिहाद करते हैं और लालगढ़ वाले पेट के वासते।
ईराक़ मे अमेरिका कौनसा ख़तरा था? असल ख़तरा तो अब है। ये जशन, आज़ादी के पटाख़े, चेहरे पर ख़ुशीयां आगे के लिए बहुत दुखद है बिलकु जैसे जंगली भैंस को खुला छोड दिया हो। उंगलीयां नींद की वजे से थक चुकी वरना इस क़िस्त मे और लम्बा भाषण छापने का इरादा था। जारी
बाक़ी फिर कभी
[ये ख़ुदा है - 78]