Archive for August, 2009

इत्र की ख़ुशबू जैसा ये कैसा फ़्लू फैल गया, दूसरों का देख हमने भी चेहरे पे मास्क चढ़ालिया। हमारे इस अंदाज़ पर अन्य लोगों ने कुछ ना बोला मगर गली मे आराम फ़रमा रहे कुत्तों को हमारा ये अंदाज़ पसंद ना आया। झटसे खडे होकर हमारे मूंह पे भोंकना शुरू करदिया। ज्लदी से मास्क उतारकर अपना परिचय करवादिया कि मियां, हम तो तुम्हारे भगवान हैं। ये सुनकर कुत्तों ने गर्दन पलटकर इध-उधर भौंकते रहे यानि कि धन्य अपने भगवान को पेहचान गए। लानत है अजब संक्रामक बीमारीयां फैल रही हैं, हम भगवान होकर भी चेहरे पे मास्क सजाए रखे हैं जिसकी वजह से इंसान तो क्या कुत्ते भी हमें पहचान्ते नहीं। एक महिला ने पूछलिया - ओह जी, काम से निकले थे मगर यहां बाज़ार मे कहां भटक रहे? उसको भी मास्क उतारकर बताना पड़ा कि हम तुम्हारे पतिदेव नहीं बल्कि बाकाईदा देव हैं।

गली मे बच्चे रंग-रंगीले मास्क पहन ऐसे फुदक रहे हैं जैसा कि त्योहार के लिए नए कपड़े पहने हैं। अब बच्चों का क्या है, जो भी नया पहनलिया बस ख़ुशी मे नाचना शुरू करदिया। महिलाएं और पुस्र्ष भी एकदूसरे को अपना मास्क दिखाकर सीना जोरी करने लगे हैं। बस स्टाप पर, रेलवे स्टेशन हर जगह मास्क को जैसे धोती और चोली समझ रखा है। बग़ैर मास्क पहने व्यक्ति पर लोग अजीब निगाहों से देखते हैं जैसा कि वे मनुष्य नहीं बल्कि वायरस-मनुष्य है। सुअर ने इतनी फ़्लू नहीं फैलाई जितना कि मीडिया वालों ने हल्ला मचा रखा। सुअर मे इतनी शक्ती कहां कि? मीडिया वालों ने ये फ़्लू फैला रखी और ख़ुद भगवान को भी स्वाइन फ्लू मास्क पहन्ने पे मजबूर करदिया।

हमारे एक मुरीद, जिसने हमारी क़िस्तें पढ़ हमपे ईमान लाए थे। सबेरे स्वाइन फ्लू का मस्क पहन जॉगिंग के लिए निकले तो गली मे आवारा कुत्ते भी उनके पीछे निकलपडे। जॉगिंग छोड़ दौड़ना शुरू करदिए, आख़िर एक खड्डे मे गिरपडे। वे बाहर निकल भी नहीं सकते क्योंकि कुत्ते उनके इंतेज़ार मे वहीं दुम दबाए बैठे थे। जैसे-तैसे बाहर निकले अपने घर पहुंचते माथे पे आलू निकल आया। गली मुहल्ले के बच्चे औ जवानों ने पुछा - ये कौनसा नया स्टाईल है?  मजबूरी मे बताना पडा कि ये कुत्ता फ़्लू है। जारी

बाक़ी फिर कभी

[ये ख़ुदा है - 79]