Archive for October, 2009
बस मे ट्रेन मे विमान मे या जहां कहीं भी कोई नया मिलजाए, स्लाम नमस्ते के बाद बात चीत शुरू होती है फिर नाम पूछते हैं तो जवाब मे बोलता हूं कि मेरा नाम शुऐब है तो वापस बोलते हैं - ओह आप मुसल्मान हो?
मेरे दिल मे एक ही उत्तर ग़ुस्से मे निकलता है “तेरी मां की………. तेरी बेहन की……….
मेरे पेट पर घूंसा मारो, पीठ पर लात मारो लेकिन उस्से भी ज़्यादा ग़ुस्सा मुझे तब आता है जब कोई मुझसे मेरा धर्म पूछता है। लगता है जैसे मेरी मां बेहन को गाली दे रहा है। मैं इंसान हूं और भारतवासी।
आपसे बिनती है कि यात्रा मे या कहीं भी अजनबीयों से उनका धर्म न पूछें न अपना धर्म बताएं वरना बात चीत और नई दोस्ती का अच्छा मूड़ कहां से कहीं और निकलजाता है। ये नया ज़माना है, हम सभी को साथ मिलकर रहना है।
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Oct