पुराने ज़माने के ख़ुदाओं की मौज थी कि अशिक्षित लोगों मे आए और छागए। और पिछले ज़माने के लोगों का काम-धाम कुछ था नहीं बस यूंही बेकार बैठे रहते थे कि उन ख़ुदाओं पर अंधों के जैसा ईमान ले आए। और हमारी क़िस्मत देखो कि नये ज़माने के ख़ुदा हैं, ८० क़िस्तें होगई मगर अभी तक किसी ने हमपे ईमान नहीं लाए और हम हैं कि क़िस्तों पे क़िस्त पोस्ट कर रहे हैं। आशा है मरने के बाद हमारी मज़ार पे चादर चढ़ाने वालों की संख्या ज़्यादा होगी मगर क्या फ़ाईदा! हमारे जीवित रहने तक किसी ने अक़ीदत की नज़र नहीं डाली।
दशहरा जलूस मे लोगों को नाचते हुए देख हमारा भी दिल मचल उठा, भीड़ मे डांस करने कूद पडे, वल्लाह! ज़बर्दस्त ठुमके भी लगा रहे थे कि अचानक एक बुज़र्ग ने आकर हमसे हमारे बारे पूछा तो हमने भी अपना कॉलर चढाकर बतादिया हम सच्ची मुच्ची के ख़ुदा हैं मतलब बाक़ाईदा और स्वयं भी हैं। बस मियां, इतनी सी बात पे हमारा ख़डा कॉलर पकड़ हमको बाहरी रास्ता दिखलाया। ख़ुदा होने का ये सिला कि आम लोगों के साथ ज़रा हंसी ख़ुशी का ठुमका भी मार नहीं सकते। ख़ैर, सुबह ईदगाह के बाहर इन्तेज़ार मे ख़डे थे कि हर कोई हमपे शक की निगाह डाल रहे थे। हालांकि पाक साफ़ कपड़े पहने हुए थे सिर्फ ईद की नमाज़ नहीं पढी तो शक करने वालों का शक और बढ़ गया। हम ना तो आतंकवाद हैं ना भीखारी! बताने ही वालते थे कि हम सचमुच ख़ुदा हैं मगर कोई पूछे तो बताते।
हमारी बदक़िस्मती कि आजके दौर मे ख़ुदा बनगए, अगर पिछले ज़माने मे होते चूंकि उस ज़माने मे लोग अनपढ थे, आज हमारी भी पूजा और इबादत होती। लोग हमारी मूर्ती बनाकर जलूस निकालते या फिर हमारी क़बर पे चादर चढ़ाकर पंखा मारते। अब लोग हैं कि अपने धर्म से उकतागए, कैसा सजदा कैसी पूजा? खुद महनत करो पैसा कमाओ और उलटा अपने भगवानों ख़ुदाओं पे लुटाओ। लोगों की आंखें खुलगई कि चमत्कारी से कोई पैसा आने को नहीं मगर फिर भी अंधों के जैसा आज भी पूजा और इबादत मे जुटे हुए हैं कि कुछ तो ख़ज़ाना मिलजाए।
बेतुल्ला मेहसूद की मृत्यु पर एक शेयर याद आता है मगर ये शेयर मां-बेहन की गालीयों पर है। खैर, ये गालीयां दिल की दुहाइयां रहीं जैसे सल्मान ख़ान ने शाहरुख़ ख़ान की न्यूयोर्क मे पाजामा तलाशी पर कहा था। मगर जसवंत सिंह की मिर्च-मसाला पुस्तक जहां भारत मे नमक कुछ ज़्यादा होगया तो पाकिस्तान मे आटा महंगा। मियां, हवाई जहाज के समय की घोषणा होगई। ये तो हवाई अड्डे पर बैठकर टैपिंग होरी है, सोचा था इस क़िस्त मे बड़ा और लम्बा भाषण पोस्ट करेंगे क्योंकिं घोषणा हुई थी कि उड़ान एक घंटा लेट है फिर अब बोल रहें कि जहाज़ तैयार खडा है। लानत है, दिल की भडास, भडास ही रही फिर मिलते हैं इंशा-अल्लाह। जारी
बाक़ी फिर कभी
[ये ख़ुदा है - 80]
रोज़ाना आज भी सुबह बालकोनी पर खड़े अंगडाई लेने ही वाले थे कि याद आया सामने ख़ूबसूरत पड़ोसन कल ही किसी और जगह नया फ़्लैट ख़रीदकर शिफ़ट होगए। वैसे पिछले दो वर्शों से बाकाईदा सुबह ठीक समय पर अंगडाई लेने हम अपनी बालकोनी पर तैयार रहते कि आजसे अपने बिसतर पर ही अंगडाई खींचनी पडेगी।
दो वर्श पहले जब उनहोंने पहली बार अपनी सामने वाली बालकोनी पे आकर सुबह अंगडाई खींचने केलिए बाहें फैलाई ही थी कि हम दोनों की नज़रें टकरा गई। उनहोने अंगडाई लेने केलिए अपने हाथ उठाए ही थे कि हमको देख शर्माके हाथ नीचे छोड दिए। फिर उसके बाद हमने ख़ाम्ख़ा रोज़ सुबह अंगडाई लेने बालकोनी पर चले आते और वो हमको छुपके देखते थे। इस छुपाछुपी मे बडा मज़ा आता था। आज सामने वाली बालकोनी वीरान है, अब हम तभी अंगडाई लेंगे जब अपने सामने वाली बालकोनी पे कोई एक नया ख़ूबसूरत पडोस आ
इत्र की ख़ुशबू जैसा ये कैसा फ़्लू फैल गया, दूसरों का देख हमने भी चेहरे पे मास्क चढ़ालिया। हमारे इस अंदाज़ पर अन्य लोगों ने कुछ ना बोला मगर गली मे आराम फ़रमा रहे कुत्तों को हमारा ये अंदाज़ पसंद ना आया। झटसे खडे होकर हमारे मूंह पे भोंकना शुरू करदिया। ज्लदी से मास्क उतारकर अपना परिचय करवादिया कि मियां, हम तो तुम्हारे भगवान हैं। ये सुनकर कुत्तों ने गर्दन पलटकर इध-उधर भौंकते रहे यानि कि धन्य अपने भगवान को पेहचान गए। लानत है अजब संक्रामक बीमारीयां फैल रही हैं, हम भगवान होकर भी चेहरे पे मास्क सजाए रखे हैं जिसकी वजह से इंसान तो क्या कुत्ते भी हमें पहचान्ते नहीं। एक महिला ने पूछलिया - ओह जी, काम से निकले थे मगर यहां बाज़ार मे कहां भटक रहे? उसको भी मास्क उतारकर बताना पड़ा कि हम तुम्हारे पतिदेव नहीं बल्कि बाकाईदा देव हैं।
गली मे बच्चे रंग-रंगीले मास्क पहन ऐसे फुदक रहे हैं जैसा कि त्योहार के लिए नए कपड़े पहने हैं। अब बच्चों का क्या है, जो भी नया पहनलिया बस ख़ुशी मे नाचना शुरू करदिया। महिलाएं और पुस्र्ष भी एकदूसरे को अपना मास्क दिखाकर सीना जोरी करने लगे हैं। बस स्टाप पर, रेलवे स्टेशन हर जगह मास्क को जैसे धोती और चोली समझ रखा है। बग़ैर मास्क पहने व्यक्ति पर लोग अजीब निगाहों से देखते हैं जैसा कि वे मनुष्य नहीं बल्कि वायरस-मनुष्य है। सुअर ने इतनी फ़्लू नहीं फैलाई जितना कि मीडिया वालों ने हल्ला मचा रखा। सुअर मे इतनी शक्ती कहां कि? मीडिया वालों ने ये फ़्लू फैला रखी और ख़ुद भगवान को भी स्वाइन फ्लू मास्क पहन्ने पे मजबूर करदिया।
हमारे एक मुरीद, जिसने हमारी क़िस्तें पढ़ हमपे ईमान लाए थे। सबेरे स्वाइन फ्लू का मस्क पहन जॉगिंग के लिए निकले तो गली मे आवारा कुत्ते भी उनके पीछे निकलपडे। जॉगिंग छोड़ दौड़ना शुरू करदिए, आख़िर एक खड्डे मे गिरपडे। वे बाहर निकल भी नहीं सकते क्योंकि कुत्ते उनके इंतेज़ार मे वहीं दुम दबाए बैठे थे। जैसे-तैसे बाहर निकले अपने घर पहुंचते माथे पे आलू निकल आया। गली मुहल्ले के बच्चे औ जवानों ने पुछा - ये कौनसा नया स्टाईल है? मजबूरी मे बताना पडा कि ये कुत्ता फ़्लू है। जारी
बाक़ी फिर कभी
[ये ख़ुदा है - 79]
पता नहीं किसका चेहरा देखकर नींद से जागे थे! सुबह बाहर निकलते फ़क़ीर से ही पाला पड़ना था? बासी मूंह लिए मूंह पर ही शिकायत ठोंका - बड़े नसीबों वाले हैं आप कि यूं बैठे बिठाए ख़ुदा बन बैठे और हमें देखो जनमसे भिखारी। पता नहीं कौनसी जड़ीबोटीयां खालिए थे कि खुद ख़ुदा होगए, ज़रा नुसख़ा तो बताओ उम्र के इस आख़िरी समय मे हम भी कुछ ख़ुदागिरी करलेते।
हमारी अच्छी क़िस्मत कि हम ख़ुदा बन बैठे मगर क़िस्मत चमकाने मे बहुत महनत चाहिए, लोगों की गालीयां, काफ़िर होने के फ़त्वे, दिल जलाने के बहाने। अगर तुम भी मेहनती होते तो आज भिख़ारी ना होते माइकल जैकसन होते, तुमहारी मृत्यु पर हज़ारों मातम करते फिर लम्बी सी मज़ार बनाकर तुमपे ही चढ़लेते।
पूछते हैं कि मेरा वोट किधर गया? हमारे ख़ुदा होने का ये सिला अब इसका भी उत्तर दें! नज़्ज़ाद ने खालिया और मौस्वी से हज़म ना हुआ। दोनों पेटभरे एक दिहाती दूसरा शहरी। अगर पूछते कि हमारी स्वतंत्रता का क्या हुआ? ज़माने से कट्टर मज़हब मे फंसने वाले इतना ज्लदी कैसे आज़ाद हों? बेचारे उच्च समाज ईरानी क़ौम धर्म से बेज़ार जो बाक़ी दुनिया के साथ क़दम मिलाना चाहते हैं, अब नज़्ज़ाद की अर्थी का इंतेज़ार करते हैं।
एक नाचने वाले के इतने दीवाने? हालांकि हम ख़ुदा ठेहरे फिर भी अजतक हमको कोई पूछने वाला नहीं। हे अफ़सोस हमें भी नाचना आता और ज़रासा ठुमका लगाकर हज़ारों को अपना मुरीद बना डालते। सलाम है उसपर जिसने धार्मिक नफ़रतों के बाव्जूद कई लोगों को अपना दीवाना बनालिया और अपनी अदाओं से इंसानों का दिल जीतकर ऐसी मशहूरी पाई कि ख़ुदा को भी पीछे छोडदिया।
चीन के जियांग शांग मे मुस्लिम फ़साद। मियां, कोई नई बात करो। जहां मुस्लमान वहां दंगाफ़साद ना हो? अब चलते हैं लालगढ़, मगर ये लाल मसजिद वाले पूछते हैं कि लालगढ़ और लाल मसजिद मे क्या अंतर है? मियां सिम्पल है कि लाल मसजिद वाले धर्म के वासते जिहाद करते हैं और लालगढ़ वाले पेट के वासते।
ईराक़ मे अमेरिका कौनसा ख़तरा था? असल ख़तरा तो अब है। ये जशन, आज़ादी के पटाख़े, चेहरे पर ख़ुशीयां आगे के लिए बहुत दुखद है बिलकु जैसे जंगली भैंस को खुला छोड दिया हो। उंगलीयां नींद की वजे से थक चुकी वरना इस क़िस्त मे और लम्बा भाषण छापने का इरादा था। जारी
बाक़ी फिर कभी
[ये ख़ुदा है - 78]